भारत की धरती पर्वतों की गोद में बसी है — उत्तर में हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर दक्षिण में नीलगिरि की हरी-भरी पहाड़ियों तक, यह देश पर्वतीय विविधता का अद्भुत संसार है।

भूमिका: पर्वत — भारत की आत्मा

जब भी हम भारत के भूगोल की बात करते हैं, तो सबसे पहले दिमाग में आता है — हिमालय। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में सिर्फ हिमालय ही नहीं, बल्कि एक दर्जन से अधिक प्रमुख पर्वत श्रृंखलाएँ हैं? ये पर्वत केवल भूगोल की किताबों में नहीं हैं — ये हमारी नदियों के जन्मदाता हैं, मानसून को आकार देते हैं, हमारी संस्कृति और आस्था के केंद्र हैं, और करोड़ों जीव-जंतुओं व वनस्पतियों के घर हैं।

भारत के पर्वत तीन प्रमुख भूवैज्ञानिक युगों के प्रतिनिधि हैं — अरावली जैसी प्राचीन श्रृंखलाएँ जो अरबों साल पुरानी हैं, विंध्य-सतपुड़ा जैसी मध्यकालीन संरचनाएँ, और हिमालय जैसी नवजात परंतु विशाल पर्वतमाला। इस ब्लॉग में हम उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक भारत की समस्त प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं की यात्रा करेंगे।

1. हिमालय पर्वतमाला — देवताओं का निवास

उत्पत्ति और विस्तार

हिमालय पृथ्वी की सबसे युवा और सबसे ऊँची पर्वत श्रृंखला है। लगभग 4–5 करोड़ वर्ष पहले जब भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियाई प्लेट आपस में टकराईं, तब इस विशाल पर्वतमाला का जन्म हुआ। आज भी हिमालय हर साल कुछ मिलीमीटर ऊपर उठ रहा है — यानी यह जीवित पर्वत है। इसका विस्तार पश्चिम में नंगा पर्वत (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) से लेकर पूर्व में नामचा बरवा (अरुणाचल प्रदेश) तक लगभग 2,500 किलोमीटर में फैला है। इसकी चौड़ाई उत्तर से दक्षिण में 160 से 400 किलोमीटर तक है।

हिमालय पाँच देशों — भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान — में विस्तृत है।

हिमालय के तीन प्रमुख उपखंड

महान हिमालय (हिमाद्रि): यह सबसे उत्तरी और सर्वोच्च श्रृंखला है। इसकी औसत ऊँचाई 6,000 मीटर से अधिक है। माउंट एवरेस्ट (8,849 मी.), कंचनजंगा (8,586 मी.), नंगा पर्वत (8,126 मी.) जैसी विश्व की सर्वोच्च चोटियाँ इसी में स्थित हैं। भारत की सर्वोच्च चोटी कंचनजंगा है जो सिक्किम और नेपाल की सीमा पर स्थित है।

मध्य हिमालय (हिमाचल): इसकी ऊँचाई 3,700 से 4,500 मीटर के बीच है। इसी श्रृंखला में पीर पंजाल, धौलाधार और मसूरी जैसी श्रृंखलाएँ आती हैं। शिमला, मनाली, मसूरी, दार्जिलिंग जैसे प्रसिद्ध हिल स्टेशन इसी क्षेत्र में बसे हैं।

शिवालिक (बाह्य हिमालय): यह हिमालय की सबसे दक्षिणी और सबसे नवीन श्रृंखला है। इसकी ऊँचाई 900 से 1,500 मीटर तक है। यह श्रृंखला जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक फैली है।

हिमालय का महत्व

हिमालय केवल पर्वत नहीं है — यह भारत का रक्षक है। यह उत्तर से आने वाली ठंडी मध्य एशियाई हवाओं को रोकता है और मानसूनी बादलों को रोककर भारत में वर्षा कराता है। गंगा, यमुना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र जैसी भारत की सबसे बड़ी नदियाँ हिमालय की हिमनदियों से ही जन्म लेती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से यह देवभूमि है — केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री जैसे तीर्थस्थल इसी की गोद में हैं।

2. ट्रांस-हिमालय और काराकोरम — विश्व की छत

हिमालय के उत्तर में ट्रांस-हिमालयन श्रृंखला स्थित है जिसमें काराकोरम, लद्दाख और जास्कर प्रमुख हैं। काराकोरम विश्व की दूसरी सबसे ऊँची चोटी K2 (8,611 मी.) का घर है, जिसे माउंट गॉडविन-ऑस्टिन भी कहते हैं। यह चोटी भारत की सर्वोच्च चोटी नहीं बल्कि भारत-प्रशासित क्षेत्र के बाहर पाक-अधिकृत कश्मीर में स्थित है। इस क्षेत्र में खारदुंग ला, जोजिला, चांग ला, और उमलिंग ला जैसे महत्वपूर्ण दर्रे भी हैं। उमलिंग ला विश्व का सबसे ऊँचा मोटर योग्य दर्रा है।

3. अरावली पर्वत श्रृंखला — दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमाला

परिचय और इतिहास

अरावली न केवल भारत की बल्कि सम्पूर्ण विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसकी आयु 2.5 अरब से अधिक वर्ष आँकी जाती है। संस्कृत में "अरावली" का अर्थ है "चोटियों की पंक्ति।" यह एक अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountain) है — अर्थात एक समय यह बहुत ऊँचा था, किंतु अरबों वर्षों के अपक्षय और अपरदन ने इसे घिस दिया।

विस्तार और प्रमुख चोटियाँ

अरावली का विस्तार दिल्ली से शुरू होकर दक्षिणी हरियाणा, राजस्थान होते हुए गुजरात के अहमदाबाद तक लगभग 700 किलोमीटर में है। इसकी सर्वोच्च चोटी गुरु शिखर है जो राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है और इसकी ऊँचाई 1,722 मीटर है। माउंट आबू इस श्रृंखला का प्रसिद्ध हिल स्टेशन है।

अरावली का पारिस्थितिक महत्व

अरावली की सबसे बड़ी भूमिका है थार मरुस्थल को रोकना। यदि अरावली न होती तो राजस्थान का रेगिस्तान दिल्ली और उससे आगे तक फैल चुका होता। दुर्भाग्य से, बेतहाशा खनन और अतिक्रमण के कारण अरावली का अस्तित्व खतरे में है।

4. विंध्य पर्वत श्रृंखला — उत्तर और दक्षिण का विभाजक

भौगोलिक परिचय

विंध्य पर्वतमाला मध्य भारत में स्थित है और यह ऐतिहासिक रूप से उत्तर भारत (आर्यावर्त) और दक्षिण भारत (दक्षिणापथ) के बीच की सीमा रही है। यह एक खंड पर्वत (Block Mountain) है जो भूगर्भीय हलचलों से बना है। यह मुख्यतः मध्यप्रदेश में फैली है, साथ ही उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात तक इसका विस्तार है।

पौराणिक महत्व

हिंदू धर्मग्रंथों में विंध्य को एक सजीव पर्वत के रूप में चित्रित किया गया है। विंध्याचल की देवी माँ विंध्यवासिनी का प्रसिद्ध मंदिर उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर में है। भीमबेटका की गुफाएँ, जो कि पाषाण काल की 700 से अधिक रॉक शेल्टर का संग्रह हैं, इसी पर्वतमाला की तलहटी में स्थित हैं।

5. सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला — "सात पर्वतों" की भूमि

सतपुड़ा का शाब्दिक अर्थ है "सात तहें।" यह श्रृंखला विंध्य के ठीक दक्षिण में स्थित है और नर्मदा एवं ताप्ती नदियों के बीच विस्तृत है। नर्मदा नदी अमरकंटक से सतपुड़ा के इसी क्षेत्र से जन्म लेती है। इसकी सर्वोच्च चोटी धूपगढ़ है, जो लगभग 1,352 मीटर ऊँची है और मध्यप्रदेश के पचमढ़ी के निकट स्थित है। पचमढ़ी, जिसे "सतपुड़ा की रानी" कहा जाता है, एकमात्र हिल स्टेशन है जो मध्यप्रदेश में है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व और मेलघाट वन्यजीव अभयारण्य इसी क्षेत्र में हैं।

6. पश्चिमी घाट (सह्याद्री) — जैवविविधता का स्वर्ग

भौगोलिक विस्तार

पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तट के समानांतर लगभग 1,600 किलोमीटर तक फैली एक अखंड पर्वत श्रृंखला है। यह गुजरात से शुरू होकर महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से गुजरती हुई कन्याकुमारी तक जाती है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 1,500 मीटर है जो उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती है।

इसे अलग-अलग राज्यों में अलग नामों से जाना जाता है — महाराष्ट्र में सह्याद्री, केरल में सह्याद्रि, तमिलनाडु में नीलगिरि

UNESCO विश्व धरोहर

पश्चिमी घाट को 2012 में UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। यह विश्व के आठ जैवविविधता हॉटस्पॉट में से एक है। यहाँ 5,000 से अधिक प्रजातियों के फूलधारी पौधे, 140 प्रजातियों के स्तनपायी, और 508 प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं।

प्रमुख चोटियाँ और हिल स्टेशन

दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटी अनाईमुडी (2,695 मीटर) केरल में पश्चिमी घाट पर ही स्थित है। नीलगिरि की सर्वोच्च चोटी दोड्डाबेट्टा (2,637 मीटर) तमिलनाडु में है। मुन्नार, वायनाड, महाबलेश्वर, ऊटी जैसे विश्वप्रसिद्ध हिल स्टेशन इसी श्रृंखला में बसे हैं। साइलेंट वैली और पेरियार नेशनल पार्क जैसे संरक्षित क्षेत्र भी यहीं हैं।

मानसून में भूमिका

पश्चिमी घाट भारतीय मानसून को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाता है। अरब सागर से आने वाले मानसूनी बादल इस श्रृंखला से टकराकर पश्चिमी तट पर भारी वर्षा करते हैं जबकि पूर्वी ढलान पर वर्षा कम होती है — यही "वृष्टि छाया प्रभाव" (Rain Shadow Effect) कहलाता है।

7. पूर्वी घाट — पूर्वी तट की टूटी-बिखरी श्रृंखला

पूर्वी घाट भारत के पूर्वी तट के साथ-साथ चलने वाली एक असंतत श्रृंखला है। यह ओडिशा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु से होकर गुजरती है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 600 मीटर है। महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी प्रमुख नदियाँ इसी क्षेत्र से होकर बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। प्रमुख चोटियाँ हैं — जिंदगाडा पीक (1,690 मी., आंध्रप्रदेश), अर्मा कोंडा (1,680 मी.) और महेंद्रगिरि (1,501 मी., ओडिशा)। पश्चिमी और पूर्वी घाट मिलकर नीलगिरि पहाड़ियों में एकत्रित होते हैं — यह तीन राज्यों कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु का संगम बिंदु है।

8. पूर्वांचल पर्वत श्रृंखला — पूर्वोत्तर का हरित परिधान

भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित पूर्वांचल श्रृंखला वस्तुतः हिमालय का पूर्वी विस्तार है। यह श्रृंखला अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में फैली है।

इसकी प्रमुख उपश्रृंखलाएँ हैं:

  • पटकाई पहाड़ियाँ — भारत-म्यांमार सीमा पर
  • नागा पहाड़ियाँ — जिनकी सर्वोच्च चोटी सारामति (3,826 मीटर) है
  • मणिपुर पहाड़ियाँ — जो नागालैंड के दक्षिण में हैं
  • मिजो पहाड़ियाँ (लुशाई पहाड़ियाँ) — जिनकी सर्वोच्च चोटी फावंगपुई (2,157 मीटर) है, जिसे "ब्लू माउंटेन" भी कहते हैं

यह सम्पूर्ण क्षेत्र घने वनों, जनजातीय संस्कृतियों और अनूठी जैवविविधता का केंद्र है।

9. नीलगिरि पहाड़ियाँ — तीन राज्यों का मिलन

नीलगिरि हिंदी में "नीला पर्वत" का अर्थ रखता है — और सचमुच ये पहाड़ियाँ दूर से नीली आभा देती हैं। यह पश्चिमी और पूर्वी घाट के संगम पर स्थित है। यहाँ की सर्वोच्च चोटी दोड्डाबेट्टा (2,637 मीटर) है। ऊटी और कोडईकनाल जैसे रमणीय पर्यटन स्थल इसी क्षेत्र में हैं। नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व भी इसी क्षेत्र में है जहाँ नीलगिरि तहर जैसे दुर्लभ जीव पाए जाते हैं।

10. मेघालय की पहाड़ियाँ — बादलों का घर

मेघालय का शाब्दिक अर्थ है "बादलों का घर" और यहाँ की खासी, गारो और जयंतिया पहाड़ियाँ विश्व की सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में से हैं। मौसिनराम और चेरापूँजी — जो दुनिया में सर्वाधिक वर्षा के लिए जाने जाते हैं — इसी क्षेत्र में हैं। शिलांग पीक (1,968 मीटर) इस क्षेत्र का सर्वोच्च बिंदु है। यहाँ की जीवित जड़ पुलें (Living Root Bridges) और चूना पत्थर की गुफाएँ विश्व में अद्वितीय हैं।

पर्वतों का भारतीय जनजीवन और संस्कृति में महत्व

भारत में पर्वत सिर्फ भूगोल नहीं हैं — वे हमारी आत्मा हैं। वेदों में हिमालय को हिमवान कहा गया है, पुराणों में कैलाश-मानसरोवर को शिव का निवास माना गया है। विंध्याचल और अरावली से जुड़ी अनगिनत लोककथाएँ हैं। पश्चिमी घाट की गोद में बसे जनजातीय समुदाय हजारों वर्षों से इन वनों को अपना घर मानते हैं।

पर्यटन की दृष्टि से भी ये पर्वत भारत की अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व योगदान करते हैं। ट्रेकिंग, पर्वतारोहण, स्कीइंग, वन्यजीव पर्यटन — सभी पर्वत आधारित हैं।

पर्वतों का संकट — बढ़ता खतरा

आज भारत की पर्वत श्रृंखलाएँ कई गंभीर खतरों का सामना कर रही हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। अरावली में अवैध खनन ने पहाड़ों को खोखला कर दिया है। पश्चिमी घाट में वनों की कटाई जारी है। पूर्वांचल की पहाड़ियों में झूम खेती से वनावरण घट रहा है।

यदि हमने समय रहते इन पर्वतमालाओं की रक्षा नहीं की, तो न केवल हम जैवविविधता खो देंगे बल्कि भारत की जलवायु और जल संसाधन भी संकट में पड़ जाएँगे।

निष्कर्ष

भारत की पर्वत श्रृंखलाएँ इस देश का ताज हैं। हिमालय की बर्फीली चोटियाँ, अरावली की प्राचीन लकीरें, विंध्य-सतपुड़ा की घनी हरियाली, पश्चिमी घाट की जैवविविधता, और पूर्वोत्तर की धुंध भरी पहाड़ियाँ — ये सब मिलकर एक ऐसा भारत बनाते हैं जो दुनिया में अद्वितीय है।

जरूरत है कि हम इन पर्वतों को केवल परीक्षाओं में याद करने तक सीमित न रखें, बल्कि इन्हें समझें, इनसे प्रेम करें और इनकी रक्षा करें। क्योंकि जब तक हिमालय है, जब तक अरावली खड़ी है, जब तक पश्चिमी घाट हरा है — तब तक भारत जीवित है।