श्रीमद् भगवत गीता Universal Scripture है | Swami Satyamitranand ji Maharaj Pravachan
इस प्रवचन में स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी बताते हैं कि मनुष्य अपने दैनिक कर्म करते हुए भी भगवान की भक्ति कर सकता है। वे श्रीमद्भगवद्गीता का संदर्भ देते हुए कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा— “तस्मात् सर्वेषु कालेषु” अर्थात जीवन के हर जाग्रत क्षण में भगवान का स्मरण किया जा सकता है। भक्ति केवल सुबह-शाम की पूजा तक सीमित नहीं है। जब तक मनुष्य जाग रहा है, वह अपने हाथों से कर्म करता रहे और साथ-साथ अपने मन को बार-बार अपने आराध्य की ओर ले जाने का प्रयास करे। धीरे-धीरे यह अभ्यास संसार के प्रति आसक्ति को बदलकर परमात्मा के प्रति प्रेम में परिवर्तित कर देता है।
सन्यास जीवन, चार आश्रम और साधना का उचित मार्ग
स्वामी जी बताते हैं कि सन्यास जीवन का अंतिम चरण है। भारतीय परंपरा में जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है— ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम। सामान्यतः व्यक्ति को पहले शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए, फिर गृहस्थ जीवन निभाना चाहिए, उसके बाद धीरे-धीरे वैराग्य की ओर बढ़ते हुए सन्यास की ओर जाना चाहिए। हालांकि यदि किसी को संसार की नश्वरता का गहरा ज्ञान हो जाए, तो वह सीधे सन्यास भी ले सकता है, पर यह मार्ग अत्यंत कठिन है। इसलिए अधिकांश लोगों के लिए उचित यही है कि वे अपने वर्तमान जीवन और कर्तव्यों को निभाते हुए ही साधना करें।
कर्म में बाधक छह दोष (नीति शास्त्र) और गीता का संतुलित जीवन संदेश
वे आगे बताते हैं कि कर्म करते समय कुछ दोष मनुष्य को सफलता से दूर कर देते हैं। नीति शास्त्र में छह प्रमुख दोष बताए गए हैं— अत्यधिक निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता (काम को टालना)। जो लोग जीवन में उन्नति और दिव्यता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इन दोषों को धीरे-धीरे दूर करना चाहिए। भगवद्गीता भी संतुलित जीवन का संदेश देती है— युक्ताहार-विहार, अर्थात भोजन, व्यवहार, कर्म और विश्राम सभी में संयम आवश्यक है।
दिनचर्या, अनुशासन, दान-उदारता और “गीता” का सार “त्याग”
स्वामी जी कहते हैं कि मनुष्य को अपनी दिनचर्या निश्चित करनी चाहिए—कितना सोना है, कब उठना है, कितना काम करना है। जो लोग बार-बार अपनी दिनचर्या बदलते रहते हैं, उनका मन अस्थिर हो जाता है, जबकि अनुशासन से बुद्धि मजबूत होती है।
वे दान और उदारता की भारतीय परंपरा का भी उल्लेख करते हैं। ऋषि दधीचि का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि उन्होंने असुरों के विनाश के लिए अपनी अस्थियाँ तक दान कर दीं। यही भारत की महान परंपरा है— ज्ञान, त्याग और उदारता की।
स्वामी जी यह भी कहते हैं कि गीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसे विश्वभर में सम्मान मिला है। वे बताते हैं कि अनेक संतों और आचार्यों ने गीता का प्रचार किया और इसे वैश्विक स्तर पर पहुँचाया। अंत में वे रामकृष्ण परमहंस की एक सरल व्याख्या का उल्लेख करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा कि “गीता” का सार “त्याग” है। जब मनुष्य त्याग की भावना अपनाता है, तभी उसे वास्तविक शांति प्राप्त होती है।
निष्कर्ष
इस प्रकार स्वामी जी का संदेश स्पष्ट है—मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, संयमित जीवन जीते हुए और निरंतर भगवान का स्मरण करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। यही कर्म, भक्ति और ज्ञान का संतुलित मार्ग है।