गीता के माध्यम से जानिए अहंकार अग्नि के समान है | Swami Satyamitranand ji Maharaj Pravachan
भारत माता की इस दिव्य प्रस्तुति में परम पूज्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी महाराज अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में कहते हैं—
“राम नाम मणि दीप धरु जी देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुं जो चाहसि उजियार॥”
वे बड़े विश्वास के साथ कहते हैं कि उनकी जिह्वा पर राम-नाम की मणि, पिछले पचास वर्षों से विराजमान है। यदि कभी क्षणभर के लिए भी विस्मरण हो जाए तो अत्यंत पीड़ा होती है। वे निरंतर नाम-स्मरण साधना का अभ्यास करते रहते हैं। वे स्वयं को न तो सिद्ध मानते हैं और न ही सिद्ध बनना चाहते हैं। उनका स्पष्ट मत है कि “बड़ा” बनना और “सिद्ध” बनना—दोनों ही अत्यंत जोखिम भरे हैं।
बड़ा बनने की साधना बनाम सहज जीवन का मार्ग | Spiritual Discipline Insight
अयोध्या की एक सरल उपमा देते हुए वे कहते हैं—वहाँ यह नहीं पूछा जाता कि “चावल पक गया?” बल्कि पूछा जाता है, “चावल सिद्ध हुआ या नहीं?” उसे दबाकर परखा जाता है। यदि एक भी कणी कच्ची रह जाए तो फिर से चढ़ा दिया जाता है। इसी प्रकार ‘सिद्ध’ होना भी एक कठिन और सूक्ष्म अवस्था है।
वे ‘बड़ा’ बनने की उपमा उड़द की दाल के बड़े से देते हैं—दाल को भिगोना, पीसना, मसाले मिलाना और फिर गरम तेल में डालना। वह तले जाते समय छटपटाता है, पर हम कहते हैं—“बड़ा बन रहा है।” अर्थात बड़ा बनने की प्रक्रिया कष्टदायक और खतरनाक भी हो सकती है। इसलिए सहज बने रहना ही श्रेष्ठ है।
राम-नाम की ज्योति और आंतरिक- बाह्य प्रकाश | Ram Naam Spiritual Power
वे कहते हैं—भगवान ने कभी उनसे कुछ माँगा नहीं, बल्कि निषेध ही किया; परंतु जब कभी राम-नाम जप की चर्चा होगी, लोग स्मरण करेंगे कि राम-नाम की मणि मनुष्य को शिरोमणि बना देती है। यह मणि मुख में, जिह्वा पर रखी जाती है—और जिह्वा देहरी के समान है। जैसे घर में प्रवेश के लिए देहरी पार करनी पड़ती है, वैसे ही राम-नाम की ज्योति भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश देती है।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जब कोई आपको नाम-जप करते देखे, तो उसके भीतर भी नाम-स्मरण की प्रेरणा जागे। इसी से भीतर-बाहर दोनों ओर उजाला फैलता है।
जीवन की नश्वरता और वैराग्य का संदेश | Spiritual Awareness from Gita
संत सूरदास जी का स्मरण करते हुए वे कहते हैं—
“जा दिन मन पंछी उड़ि जइहै,
ता दिन तेरे तन तरुवर के सब पात झरि जइहैं।”
जिस दिन प्राण-पक्षी उड़ जाएगा, उस दिन परिवारजन भी अधिक देर तक साथ नहीं रख पाएँगे। संसार की नश्वरता को समझकर वैराग्य भाव जाग्रत होना चाहिए।
इसी संदर्भ में वे श्रीमद्भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने अर्जुन को ‘अनघ’ कहा—अर्थात पापरहित। वे बताते हैं कि धृतराष्ट्र, अर्जुन और संजय—इन तीनों के बिना गीता का प्राकट्य संभव न होता। विशेषकर धृतराष्ट्र, जो पापों के साक्षी रहे, उन्हें भी गीता सुनने का अवसर मिला—यह परमात्मा की करुणा का अद्भुत उदाहरण है।
मानव जीवन, साधना में निष्ठा और हनुमान जी का आदर्श
मानव शरीर को वे नौका के समान बताते हैं—परंतु यह नौका ‘नव-छिद्रों’ से युक्त है। फिर भी प्राण-शक्ति सौ वर्ष तक उसमें स्थित रहती है—यह आश्चर्य की बात है। आश्चर्य प्राणों के चले जाने में नहीं, बल्कि उनके इतने समय तक टिके रहने में है।
वे निष्कर्ष देते हैं कि साधना में निष्ठा अत्यंत आवश्यक है। चंचल बुद्धि वाला व्यक्ति साधनाएँ बदलता रहता है, पर स्थिरता से ही सिद्धि संभव है।
निष्ठा का सर्वोत्तम उदाहरण वे हनुमान जी को मानते हैं—जिन्होंने जीवन भर केवल राम-सेवा को ही अपनाया। लंका-दहन के पश्चात एक क्षण के लिए अहंकार का भाव आया, पर तुरंत उन्होंने उसे पहचान लिया और समुद्र में कूदकर प्रभु के चरणों में शरण ली।
निष्कर्ष | Ram Naam Pravachan Message
इस प्रकार स्वामी जी का संदेश स्पष्ट है—
बड़ा बनने की नहीं, सहज रहने की साधना करो।
सिद्ध होने की नहीं, निरंतर नाम-स्मरण की भावना रखो।
राम-नाम की मणि को जिह्वा-देहरी पर धारण करो—तभी भीतर और बाहर दोनों ओर सच्चा प्रकाश होगा।