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धर्म प्रेम सिखाते हैं | Dharm Prem Shikhate Hain | Swami Satyamitranand Giri Ji Maharaj | Gita Gyan & Bharat Mata Mandir

जब-जब परम पूजनीय स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज उपासना के क्षणों में परमात्मा के चरणों में बैठते थे, तब-तब उनकी यही प्रार्थना रहती थी कि परमात्मा उनके राष्ट्र को सर्वविधि समृद्ध एवं सम्पन्न बनाएँ। यह कथन केवल शब्द नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति और अध्यात्म का जीवंत दर्शन है।

हरिद्वार स्थित भारत माता मंदिर के संस्थापक, पद्मभूषण महामंडलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज का जन्म 19 सितंबर 1932 को आगरा में हुआ। मूलतः उत्तर प्रदेश के सीतापुर से संबंध रखने वाले स्वामी जी बचपन से ही अध्ययनशील, चिंतनशील और सेवा-भाव से परिपूर्ण रहे। धर्म, संस्कृति, समाज और विश्व कल्याण के लिए उनकी अद्वितीय सेवाओं के लिए उन्हें पद्मभूषण सम्मान से अलंकृत किया गया।

अपने एक प्रेरणादायी प्रवचन में स्वामी जी बताते हैं कि जीवन के पथ पर जब विषाद, उन्माद और प्रमाद मनुष्य को घेर लेते हैं, तब किंकर्तव्यविमूढ़ता कर्मशक्ति का हरण कर लेती है। यही स्थिति महाभारत की रणभूमि में अर्जुन के जीवन में भी आई थी, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उनके कर्तव्य का बोध कराया।

आज के समय में भी श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश उतना ही प्रासंगिक है। स्वामी जी कहते हैं —

“विषाद, उन्माद और प्रमाद से उत्पन्न विवाद से बचना है, तो संवाद की रचना अनिवार्य है।”

परमात्मा के साथ संवाद होने पर विवाद का अंत हो जाता है और उसी संवाद से धन्यवाद की परंपरा जन्म लेती है। गीता इसी धन्यवाद की स्थापना का शाश्वत संदेश देती है, जिससे मानवमात्र का कल्याण संभव हो सके।

जीवन को सरिता (नदी) के समान बताते हुए स्वामी जी समझाते हैं कि जैसे नदी ऊँचाई और गहराई दोनों से होकर बहती है, वैसे ही जीवन भी उन्नति और अवनति के चक्र में चलता रहता है। इस परिवर्तनशील जीवन में केवल ईश्वरीय भक्ति और सत्कर्म ही अटल सत्य हैं।

उपनिषदों के अनुसार, असत्य आचरण से युक्त जीवन अंधकारमय हो जाता है। जब बुद्धि सही मार्ग दिखाए, किंतु मन और आकर्षण विपरीत दिशा में ले जाएँ — और आकर्षण बुद्धि पर विजय पा ले — वही क्षण मानव जीवन के पतन का कारण बनता है।

परम पूजनीय स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज के उपदेश हमें सदैव सत्य, संवाद, कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहेंगे।

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