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स्वार्थ को त्याग कर्तव्यों का निर्वाह करते रहना चाहिए | सांवलिया सेठ | Swami Satyamitranand Maharaj

जब हम त्रेता युग का स्मरण करते हैं, तो मन स्वतः ही भगवान श्रीराम के आदर्शों की ओर चला जाता है। वह युग, जहाँ चक्रवर्ती साम्राज्य होते हुए भी वैभव को कभी सर्वोच्च नहीं माना गया। भगवान श्रीराम ने यह सिखाया कि सबसे बड़ी संपत्ति धर्म, मर्यादा और परमात्मा का स्मरण है, न कि भौतिक अधिकार या संपत्ति।

आज के समय में जब छोटे-छोटे विषयों पर संपत्ति के लिए झगड़े होते हैं, तब रामायण हमें यह बोध कराती है कि संपत्ति से बड़ा त्याग और कर्तव्य होता है। भगवान श्रीराम का जीवन यह संदेश देता है कि यदि परमात्मा हमारे साथ हैं, तो कोई भी विपत्ति वास्तविक विपत्ति नहीं रहती। जैसे जब हनुमान जी समुद्र पार करते हैं, तब भूमि का छूट जाना भी बाधा नहीं बनता — क्योंकि प्रभु-स्मरण ही सबसे बड़ा बल है।

स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज अपने उपदेशों में कहते हैं कि विपक्ष को आमंत्रण मत दीजिए, अर्थात नकारात्मक विचारों, संशय और भय को अपने जीवन में प्रवेश न करने दें। केवल परमात्मा का स्मरण और संवाद ही मनुष्य को सुरक्षित रखता है। परमात्मा की प्रतिज्ञा है कि वे अपने भक्तों की रक्षा बालक की भाँति करते हैं।

मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन फल की चिंता किए बिना करना चाहिए। जैसे एक मुनीम ईमानदारी से पूरे महीने का हिसाब रखता है और निश्चित रूप से उसे वेतन प्राप्त होता है, वैसे ही सत्कर्म करने वाले को भी परमात्मा का फल अवश्य मिलता है। संसार का सबसे बड़ा सांवला सेठ स्वयं परमात्मा हैं, जो प्रत्येक कर्म का न्यायपूर्ण प्रतिफल देते हैं।

यदि मनुष्य निरंतर ईश्वर पर विचार करता रहे, अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दे और जीवन को आदर्श बनाने का प्रयास करे, तो वह स्वयं भी प्रेरणा बन जाता है। परमात्मा के चरणों में प्रसन्नता और कृतज्ञता ही जीवन का सार है।

स्वामी जी ने 108वीं धर्मसभा, शिकागो में संबोधन के दौरान कहा था—

“मैं सबका सम्मान करता हूँ, पर मेरी माता सबसे बड़ी भारत माता हैं।”

यही भाव राष्ट्रभक्ति, अध्यात्म और कर्तव्य का संगम है।

ऐसे ही रामायण, गीता, स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज के प्रवचन और भारत माता से जुड़े आध्यात्मिक संदेशों के लिए
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