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जीवन को दुर्घटनाओं से कैसे बचायें | Swami Satyamitranand Giri Ji

आज का मनुष्य जीवन की गाड़ी को बहुत तेज़ गति से दौड़ा रहा है, लेकिन विवेक का ब्रेक लगाना भूलता जा रहा है। जहाँ असत्य, अन्याय, अंधकार और संघर्ष है, वहीं यदि मनुष्य अपने विवेक से जीवन को रोककर आत्मचिंतन करे, तो अनेक दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है।
परम पूजनीय स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज अपने प्रवचन में बताते हैं कि जीवन घटनाओं से भरा है, लेकिन जीवन को दुर्घटना-प्रधान नहीं होना चाहिए।

पुराणों के अनुसार रोग, शोक, अपमान और संघर्ष जीवन की घटनाएँ हैं, जिन्हें रोका नहीं जा सकता; परंतु यदि मनुष्य परमात्मा का स्मरण, संतों का संग और सद्विचार को अपनाए, तो वह जीवन की बड़ी दुर्घटनाओं से स्वयं को बचा सकता है। जैसे रेल यात्रा में सिग्नल सावधानी का संकेत देते हैं—
“सावधानी हटी, दुर्घटना घटी”
वैसे ही जीवन में भी विवेक हटते ही पतन प्रारंभ हो जाता है।

स्वामी जी उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि कभी-कभी मनुष्य बिना सोचे बोल देता है, किसी बड़े का अपमान कर बैठता है या क्रोध में अनुचित व्यवहार कर लेता है। ये छोटी घटनाएँ आगे चलकर बड़ी दुर्घटनाओं का कारण बन जाती हैं। इसलिए वाणी, दृष्टि और विचार—तीनों पर संयम आवश्यक है।

भगवान ने मनुष्य को विवेक रूपी अमूल्य रत्न दिया है, जो सोने और हीरे से भी अधिक मूल्यवान है। यदि इस विवेक को संभालकर रखा जाए, तो जीवन सुंदर, संतुलित और मंगलमय बन सकता है।
जीवन का महत्त्व इसी में है कि हम क्या देखें, क्या बोलें और कैसे आचरण करें—इसका निर्णय विवेक से लें।

स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज के ये उपदेश हमें सिखाते हैं कि जीवन की गति तेज़ हो सकती है, लेकिन दिशा सदैव सही होनी चाहिए।

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