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स्वच्छता और पवित्रता का अंतर | Swami Satyamitranand Giri Ji Maharaj

स्वच्छता और पवित्रता—ये दोनों शब्द सुनने में समान लगते हैं, लेकिन इनके अर्थ में गहरा अंतर है। स्वच्छता बाहरी होती है, जबकि पवित्रता भीतर की अवस्था है। परम पूजनीय संतों के अनुसार, केवल शरीर या वस्त्रों की सफ़ाई ही पर्याप्त नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं और चेतना की शुद्धता ही वास्तविक पवित्रता है।

एक साधारण उदाहरण से यह अंतर स्पष्ट होता है। यात्रा के दौरान यदि कोई व्यक्ति स्वच्छ दिखाई दे, लेकिन उसके विचार असंयमित हों, तो वह केवल स्वच्छ है—पवित्र नहीं। हमारे सनातन संस्कारों में भगवान के दर्शन, पूजन और प्रवचन के लिए अलग वस्त्र, अलग पात्र और अलग भाव रखने की परंपरा इसी कारण से है, ताकि बाह्य स्वच्छता के साथ-साथ अंतःकरण भी पवित्र हो।

शास्त्रों में कहा गया है—
“पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा”
अर्थात व्यक्ति किसी भी अवस्था में हो, यदि उसका मन शुद्ध है तो वही उसकी सच्ची पवित्रता है।

भगवान को अर्पित किया गया जल, फल या प्रसाद केवल वस्तु नहीं होता, बल्कि वह भावना और श्रद्धा का प्रतीक होता है। जब भक्त यह प्रार्थना करता है कि “हे परमात्मा, मेरी भगवत्ता का सिंचन मेरे भीतर करिए”, तो वह अपने जीवन को उच्च चेतना की ओर ले जाने का प्रयास करता है।

पवित्रता का अर्थ है—
✔ विचारों की शुद्धि
✔ इंद्रियों पर संयम
✔ वाणी में मर्यादा
✔ और कर्म में धर्म

जब व्यक्ति बाहरी स्वच्छता के साथ अंतःकरण की पवित्रता को अपनाता है, तभी वह आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ता है और ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ पाता है।

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