भारत रत्न से सम्मानित Dhondo Keshav Karve | विधवा पुनर्विवाह और Education Revolution के जनक

धोंडो केशव कर्वे का परिचय

आज हम सुनेंगे एक ऐसे भारत रत्न की कहानी जिन्होंने अपने जीवन के लगभग सौ वर्षों में, कई विधवाओं और महिलाओं के जीवन में आशा के दीप जलाए और उनके उद्धार के लिए संघर्ष किया। जैसे एक दीपक अंतिम समय तक जलता रहता है और दूसरों को प्रकाश देता है, वैसे ही इन्होंने अपना जीवन दूसरों के लिए जिया।
ये कहानी है धोंडो केशव कर्वे  की। 

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

इनका जन्म 18 अप्रैल 1858 को केशव पंत और लक्ष्मीबाई के घर रत्नागिरी जिले के कोकण क्षेत्र में हुआ था। धोंडो ने अपने धार्मिक घर में गुरूचरित्रे और शिव लीला अमृत जैसी धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन किया। गरीबी और संघर्ष के बीच पले-बढ़े धोंडो की मां ने उन्हें हमेशा आत्मसम्मान से समझौता न करने की शिक्षा दी। एक बार जब बारोडा के महाराज ने ब्राह्मणों को गायों के साथ 10 रुपये देने का प्रस्ताव रखा, तो धोंडो ने अपनी मां से पूछा कि क्या वह भी यह उपहार ले सकते हैं। तो उनकी मां ने जवाब दिया:
"तुम उस परिवार में जन्मे हो, जो उपहार नहीं मांगता! तुम्हारे पूर्वजों में कई विद्वान थे, परंतु उन्होंने कभी किसी से उपहार नहीं लिया।"

शिक्षा में संघर्ष

धोंडो ने अपनी पढ़ाई रत्नागिरी जिले के एक छोटे से समुद्र तटीय गांव में शुरू की। यहीं उन्होंने अपने गुरु और मार्गदर्शक विनायक लक्ष्मण सोमण से मिलकर पढ़ाई की। सोमण, जो एक राष्ट्रवादी भी थे, धोंडो को देश की घटनाओं के बारे में जानने के लिए स्थानीय मंदिर में हर शाम समाचार पत्र जोर से पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।
धोंडो ने शिक्षक बनने के लिए परीक्षा देने का निर्णय लिया। उनके पास दो विकल्प थे, मुंबई या सतारा। समुद्र के रास्ते मुंबई न जाने के कारण उन्होंने सतारा जाने का रास्ता चुना, जो चार दिनों का सफर था और जिसमें सह्याद्रि पर्वत को पार करना पड़ता था। जब वह सतारा पहुंचे, तो उन्हें यह परीक्षा देने से मना कर दिया गया क्योंकि उनकी आयु 17 वर्ष से कम थी। अगले साल उन्होंने कोल्हापुर में परीक्षा दी और सफलता प्राप्त की। इस दौरान उनकी शादी राधाबाई  से हुई थी। इसके बाद उन्होंने मुंबई में अध्ययन जारी रखा और पिता की मृत्यु के बाद भाई ने उनकी पढ़ाई के लिए मदद की। उन्होंने ट्यूशन भी दी और अत्यंत संघर्ष के बाद 1884 में एल्फिंस्टन कॉलेज, मुंबई से स्नातक की डिग्री प्राप्त की।
जब कर्वे  ने काम करना शुरू किया, तो उन्होंने सुनिश्चित किया कि उनकी आय का एक हिस्सा हमेशा चैरिटी के लिए अलग रखा जाए। उन्होंने मुर्ड गांव के विकास के लिए एक छोटी सी निधि बनाई, सड़कों का निर्माण किया और वहां एक अंग्रेजी हाई स्कूल की स्थापना की। कुछ समय तक वह एल्फिंस्टन हाई स्कूल, मुंबई में काम करते थे, लेकिन वहां के माहौल से उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। फिर वे सेंट पीटर्स स्कूल में शामिल हो गए, और वहां रोजाना पैदल जाते थे। उनकी पत्नी राधाभाई एक महत्वपूर्ण सहायक थीं। दुर्भाग्यवश, राधाबाई की अचानक मृत्यु ने कर्वे को गहरा सदमा दिया। 

समाज सुधार और विधवा पुनर्विवाह

कर्वे को उस समय की विधवाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार से आघात लगा। छोटी छोटी लड़कियों की 60-70 साल के बुजुर्गों से शादी करवा दी जाती थी, और जब वो गुज़र जाते थे, तो उन्हें एक काले कमरे में अकेले जीवन बिताने के लिए छोड़ दिया जाता था। इन महिलाओं को उनके पिछले जन्मों के पापों के रूप में दोषी ठहराया जाता था। जब लोगों ने कर्वे  से फिर से शादी करने को कहा, तो उन्होंने कहा, "मैं एक विधुर हूं, अगर मैंने फिर से शादी की तो वह भी एक विधवा ही होगी।" इस पर उनके मित्र के पिता बालकृष्ण जोशी ने जवाब दिया, "अगर आपने विधवा से ही शादी करने का निश्चय कर लिया है, तो क्यों न यह मेरी बेटी गोदूबाई से ही हो?" गोदूबाई, जो कर्वे  के सबसे अच्छे दोस्त नारहरी पंत की बहन थीं, उनसे कर्वे  ने शादी की और उनका नाम विवाह के बाद आनंदिबाई रख दिया। हालांकि, कर्वे  की यह विधवा से शादी करने की साहसिकता पारंपरिक समाज के लिए अस्वीकार्य थी और यह कई समाचार पत्रों में चर्चा का विषय बन गई।
कर्वे  के साथ समाज ने भेदभाव किया, लेकिन उन्होंने समाज से कोई नाराजगी नहीं रखी। वे जानते थे कि समाज में सुधार लाने के लिए कुछ कष्टों का सामना करना पड़ता है। उनका मानना था कि समाज का सुधार धीरे-धीरे होना चाहिए, इसे बलपूर्वक नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने विधवाओं के उद्धार के लिए अपना मिशन जारी रखा और विधवा विवाह संघ की स्थापना की। उनका उद्देश्य था उन पुरुषों को एक मंच प्रदान करना जो विधवाओं से शादी करना चाहते थे और लोगों को इस बारे में शिक्षित करना।

महिला शिक्षा की दिशा में योगदान

कर्वे  ने महसूस किया कि समाज में सुधार के लिए लोगों को पहले शिक्षा देना जरूरी है। 1896 में पुणे में उन्होंने अनंता बालिका आश्रम की स्थापना की, जहां कई शिक्षित महिलाएं जैसे पार्वतीभाई अथावले, काशीभाई देवधर ने काम किया। इस आश्रम में कई विधवाओं को शिक्षा दी गई और उन्हें आत्मनिर्भर बनने मे मदद दी गई। इस यात्रा में उन्हें व्यक्तिगत कठिनाईयाँ झेलनी पड़ीं, क्योंकि उन्हें आश्रम के काम के लिए पुणे से हिंजे तक रोजाना 4 मील की कीचड़ भरी सड़क पार करनी पड़ती थी। उन्हें अपनी पत्नी और बच्चों की अनदेखी करनी पड़ी, और उन्हें खुद भी कभी कभी अपने परिवार की खुशियों का त्याग करना पड़ा। उनका जीवन न केवल समाज के लिए बल्कि उनके परिवार के लिए भी एक बलिदान था।

कर्वे की पूरी जिंदगी महिलाओं के उद्धार, समाज सुधार और शिक्षा में समर्पित रही। उन्होंने महिलाओं के लिए एक विश्वविद्यालय स्थापित करने का विचार किया, जो 1916 में हिंजे में स्थापित हुआ। इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य था महिलाओं को शिक्षा देना, उनकी व्यक्तिगत विकास में सहायता करना, और उन्हें देश निर्माण में सक्रिय नागरिक बनाना।

राष्ट्रीय सम्मान और भारत रत्न

उनकी मेहनत और समर्पण को पहचान मिली और उन्हें 1955 में पद्म विभूषण और 1958 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनका जीवन एक प्रेरणा है, जिसमें उन्होंने समाज में सुधार लाने के लिए खुद को पूरी तरह से अर्पित कर दिया। यह महत्वपूर्ण है कि डॉ. कर्वे भारत के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिनके ऊपर भारतीय डाक विभाग ने एक डाक टिकट जारी किया। उनके उत्कृष्ट आचरण और सामाजिक कार्यों के कारण उन्हें "महर्षि कर्वे" भी कहा गया।
कर्वे  की अंतिम शब्दों में उनका दृष्टिकोण साफ था: "अगर स्वराज्य को कल्याणकारी राज्य में बदलना है, तो एक मंत्र है - सभी के भले के लिए विचार करने का मंत्र, जो हमारे प्राचीन ग्रंथों में है।"
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