बृहदीश्वर मंदिर का रहस्य! 1000 साल पुराना शिव मंदिर, जिसकी छाया नहीं पड़ती

बृहदीश्वर मंदिर, जिसे बिग टेम्पल के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय वास्तुकला का अद्वितीय उदाहरण और यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का हिस्सा है। यह मंदिर तमिलनाडु के तंजावुर शहर में स्थित है, और इसे राजा राजा चोल I द्वारा 1010 ईस्वी में बनवाया गया था। यह मंदिर चोल साम्राज्य की समृद्धि, कला, संस्कृति और धार्मिक विश्वासों का प्रतीक है। बृहदीश्वर मंदिर को द्रविड़ीय वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है, जिसमें अद्वितीय निर्माण तकनीक और कला के अद्भुत प्रमाण हैं।

इतिहास और निर्माण

बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण राजा राजा चोल I के शासनकाल में हुआ, जिन्होंने चोल साम्राज्य को एक महान शक्ति के रूप में स्थापित किया। राजा राजा चोल का मुख्य उद्देश्य इस मंदिर के माध्यम से भगवान शिव की पूजा और चोल साम्राज्य की भव्यता को दुनिया के सामने लाना था। राजा राजा चोल ने यह मंदिर भगवान शिव के सम्मान में बनवाया था, ताकि उनकी श्रद्धा और आस्था को प्रकट किया जा सके।

राजा राजा चोल के शासनकाल में चोल साम्राज्य ने दक्षिण भारत, श्रीलंका, और दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में विजय प्राप्त की थी। उन्होंने चोल कला और संस्कृति को प्रोत्साहित किया, और इसके अंतर्गत बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण हुआ। यह मंदिर राजा राजा चोल की धर्मनिष्ठा, कारीगरी और स्थापत्य कला का अद्वितीय उदाहरण है।

वास्तुकला और डिजाइन

बृहदीश्वर मंदिर की वास्तुकला का विश्लेषण करते समय यह स्पष्ट होता है कि यह द्रविड़ीय शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर का डिज़ाइन पूरी तरह से चोल शैली में है, जो दक्षिण भारत की पारंपरिक मंदिर वास्तुकला को दर्शाता है। इस मंदिर की विशिष्टता इसका विशाल आकार, अद्भुत शिखर (विमान), और अद्वितीय निर्माण तकनीक में है।

इस मंदिर का शिखर दक्षिण भारत के सबसे ऊंचे विमानों में से एक है। इसका शिखर 66 मीटर ऊंचा है और इसका कुंबम (शीर्ष) लगभग 80 टन का है। मंदिर का शिखर पूरी तरह से ग्रेनाइट पत्थरों से बना हुआ है, और इसे स्थापत्य कौशल का एक अद्भुत उदाहरण माना जाता है। इसे निर्माण के दौरान विभिन्न प्रकार की इंजीनियरिंग तकनीकों का उपयोग किया गया था, जिनमें एक विशेष रैंप का उपयोग किया गया था, जिसकी मदद से भारी पत्थर को शिखर तक पहुंचाया गया था।

मंदिर का गर्भगृह (sanctum) एक शानदार संरचना है। इसमें कोई पिलर नहीं है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाता है। इसका निर्माण तकनीकी दृष्टि से बेहद दिलचस्प है, क्योंकि गर्भगृह को एक बड़ी शिला के ऊपर रखकर बनाया गया था। इस प्रकार की संरचना इस बात का प्रमाण है कि चोल कारीगरों के पास उस समय के लिए अत्याधुनिक इंजीनियरिंग और वास्तुकला का ज्ञान था।

इसके अलावा, बृहदीश्वर मंदिर को बिना किसी मजबूत नींव के सीधे जमीन पर बनाया गया था। इस तकनीक को फसल तकनीक कहा जाता है, जिसमें ग्रेनाइट पत्थरों को बिना किसी मोर्टार या सीमेंट के एक के ऊपर एक रखा गया है। यह मंदिर बिना किसी मजबूती के भी अपनी जगह पर खड़ा है, जो इसकी स्थापत्य कला और कारीगरी का प्रमाण है।

मंदिर की मूर्तियाँ और पेंटिंग्स

बृहदीश्वर मंदिर में न केवल अद्भुत वास्तुकला है, बल्कि यहाँ की मूर्तियाँ और पेंटिंग्स भी दर्शनीय हैं। मंदिर के भीतर और बाहर दीवारों पर कई भव्य मूर्तियाँ और वॉल पेंटिंग्स देखी जा सकती हैं, जो उस समय के धार्मिक जीवन और संस्कृति को दर्शाती हैं। मंदिर में भगवान शिव, गणेश, सरस्वती, विष्णु, और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं। इन मूर्तियों की कारीगरी और रूपांकन को देखकर यह समझा जा सकता है कि चोल साम्राज्य में कला और शिल्प के क्षेत्र में कितना अधिक कौशल था।

मंदिर के अंदर दीवारों पर जो म्यूरल्स (वॉल पेंटिंग्स) हैं, वे इस मंदिर की प्रमुख विशेषताओं में से एक हैं। इनमें से कुछ चित्रण भगवान शिव के विभिन्न रूपों को दर्शाते हैं, जैसे कि एक म्यूरल में भगवान शिव को रिवॉल्विंग चेयर पर दिखाया गया है, जिसे भगवान ब्रह्मा चला रहे हैं। इसके अलावा, मंदिर में भगवान बुद्ध की छवियाँ भी पाई जाती हैं, जो यह दर्शाती हैं कि उस समय दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म का भी प्रभाव था।

मंदिर की विशेषताएँ और मिथक

बृहदीश्वर मंदिर से जुड़ी कई रोचक कहानियाँ और मिथक हैं। इन मिथकों में से एक प्रसिद्ध मिथक यह है कि दोपहर के समय जब सूर्य मंदिर के शिखर पर सीधे पड़ता है, तो इसके नीचे कोई छाया नहीं पड़ती। यह एक असाधारण विशेषता है, और यह आज तक वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए एक रहस्य बना हुआ है। इस अद्वितीय विशेषता का वैज्ञानिक और वास्तुकला के दृष्टिकोण से कई बार अध्ययन किया गया है, लेकिन इसका वास्तविक कारण आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।

इसके अलावा, मंदिर में नंबर 9 का विशेष महत्व है। मंदिर की संरचनाओं और विभिन्न चित्रों में इस संख्या का उपयोग विशेष रूप से किया गया है। इस संख्या का उपयोग रहस्यमय तरीके से किया गया है और इसे किसी गुप्त अर्थ से जोड़ा जाता है। इस संख्या के उपयोग ने मंदिर के रहस्यों को और भी अधिक आकर्षक बना दिया है।

मंदिर के बाहरी संरचनाएँ और मूर्तियाँ

बृहदीश्वर मंदिर का बाहरी भाग भी उतना ही भव्य और अद्वितीय है। मंदिर के बाहर भगवान शिव के वाहन नंदी की विशाल और भव्य मूर्ति स्थित है। यह मूर्ति लगभग 12 फीट ऊंची है और इसे ग्रेनाइट पत्थर से काटकर बनाया गया है। यह मूर्ति अत्यधिक आकर्षक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मंदिर के धार्मिक महत्व को और बढ़ाती है।

इसके अलावा, मंदिर के बाहरी हिस्से में कई अन्य मूर्तियाँ और चित्रण हैं, जिनमें भैरव, दुर्गा, सरस्वती, गणेश और विष्णु की मूर्तियाँ शामिल हैं। ये मूर्तियाँ चोल साम्राज्य की धार्मिक विविधता और समृद्ध संस्कृति को दर्शाती हैं।

यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट

बृहदीश्वर मंदिर को 1987 में यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। यह मंदिर ग्रेट लिविंग चोला टेम्पल्स के अंतर्गत आता है, जिसमें अन्य दो प्रमुख मंदिर गंगाईकोंडा चोलापुरम और रावत ईश्वर मंदिर भी शामिल हैं। इन तीनों मंदिरों को एक साथ लिविंग टेम्पल्स कहा जाता है, क्योंकि इन मंदिरों में आज भी नियमित पूजा और धार्मिक गतिविधियाँ होती हैं। ये मंदिर चोल साम्राज्य की धरोहर के रूप में आज भी जीवित हैं और हर दिन श्रद्धालुओं की भीड़ को आकर्षित करते हैं।

निष्कर्ष

बृहदीश्वर मंदिर भारतीय वास्तुकला और सांस्कृतिक धरोहर का अद्वितीय उदाहरण है। यह मंदिर न केवल चोल साम्राज्य की धार्मिक और सांस्कृतिक शक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय स्थापत्य कला की उत्कृष्टता का भी प्रतीक है। इसके अद्भुत निर्माण, मूर्तियों, पेंटिंग्स और मिथकों ने इसे एक महान ऐतिहासिक स्थल बना दिया है। यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण स्थल है, और इसके धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व ने इसे पूरे दुनिया में प्रसिद्ध बना दिया है।

इस मंदिर का अध्ययन करने से हम भारतीय संस्कृति, कला, और धार्मिकता के गहरे पहलुओं को समझ सकते हैं। बृहदीश्वर मंदिर न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आज भी लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। अगर आप भारतीय संस्कृति और इतिहास में रुचि रखते हैं, तो बृहदीश्वर मंदिर का दौरा अवश्य करें और इसके अद्भुत वास्तुशिल्प और धार्मिक महत्व को महसूस करें।

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