त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का रहस्य | Kaal Sarp Dosh Mukti | Trimbakeshwar Jyotirlinga History

कहते हैं कालसर्प दोष को दूर करने के लिए देश के प्रमुख तीर्थ स्थानों में त्र्यंबकेश्वर मंदिर का भी बहुत बड़ा नाम है। मान्यता है कि शिव के इस पावन धाम पर विधि-विधान से पूजन करने पर व्यक्ति को कालसर्प दोष से मुक्ति मिल जाती है।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्व

भारत में देवों के देव महादेव को समर्पित ऐसे कई मंदिर हैं, जो अनेक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। सनातन धर्म में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग का विशेष महत्व है। त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर बारह ज्योतिर्लिंग में शामिल है, जो महाराष्ट्र के नासिक जिले के पास ब्रह्मगिरी पर्वत की तलहटी मे स्थित है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां स्थित शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ था, यानी इसे किसी ने स्थापित नहीं किया था।

त्र्यंबकेश्वर का पौराणिक इतिहास

त्र्यंबकेश्वर से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, प्राचीन काल में ब्रह्मगिरी पर्वत पर ऋषि गौतम तपस्या में लीन रहते थे। इस क्षेत्र में कुछ अन्य ऋषि थे जो गौतम ऋषि से ईर्ष्या करते थे। एक दिन उन ऋषियों ने गौतम ऋषि पर गौहत्या का आरोप लगाया। इसके बाद सभी ऋषियों ने यह मांग की कि गौतम ऋषि को इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए देवी गंगा को इस स्थान पर लाना होगा।

गौतम ऋषि ने शिवलिंग की स्थापना कर पूजा आरंभ की, और उनकी गहरी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी और माता पार्वती वहां प्रकट हुए। भगवान शिव ने ऋषि से वरदान मांगने को कहा, और ऋषि ने देवी गंगा को इस स्थान पर भेजने का वरदान मांगा। देवी गंगा ने यह शर्त रखी कि यदि शिवजी भी यहां रहेंगे, तो वह भी यहां आकर बसेगी। शिवजी ने उनकी इच्छा पूरी की और त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में यहां वास किया, साथ ही गंगा नदी गौतमी के रूप में बहने लगी।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर की विशेषताएँ

त्र्यंबकेश्वर मंदिर बेहद प्राचीन है, और इसमें तीन छोटे-छोटे शिवलिंग स्थापित हैं, जो क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप माने जाते हैं। मंदिर के पास तीन प्रमुख पर्वत स्थित हैं:

  1. ब्रह्मगिरी पर्वत - जिसे शिव स्वरूप माना जाता है।

  2. नीलगिरी पर्वत - जिस पर नीलाम्बिका देवी और दत्तात्रेय गुरु का मंदिर स्थित है।

  3. गंगा द्वार पर्वत - जहां देवी गोदावरी का मंदिर स्थित है।

मंदिर में शिवलिंग के चरणों से लगातार जल की बूंदें टपकती रहती हैं, जो पास स्थित कुंड में जमा हो जाती हैं।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर और धार्मिक घटनाएँ

कहा जाता है कि, बहुत सी घटनाओं की साक्षी है यह त्रिम्बकेश्वर शिव मंदिर। जैसे भगवान राम अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध करने के लिए यहाँ आए थे। गौतम ऋषि ने कुशावर्त कुंड में पवित्र स्नान किया था। मंदिर की शुरुआत में, एक सफेद संगमरमर से बना नंदी है। ऐसा माना जाता है कि यदि कोई नंदी के कान में अपनी आकांक्षा बताता है, तो वह उसे भगवान शिव को बताता है, जिससे उसकी इच्छा जल्दी से पूरी होती है।

त्र्यंबकेश्वर के अन्य धार्मिक संस्थान

त्र्यंबकेश्वर में कई रुद्राक्ष के वृक्ष हैं। जैसे कि भगवान त्र्यंबकेश्वर को रुद्र, लघु रुद्र, महा रुद्र, अतिरुद्र पूजा के रूप में जाना जाता है। त्र्यंबकेश्वर नगरी में अन्य धार्मिक संस्थान भी हैं, जैसे कि:

  • संस्कृत पाठशाला - जहां वैदिक शिक्षा दी जाती है।

  • कीर्तन संस्थान - जहाँ भजन-कीर्तन किए जाते हैं।

  • प्रवचन संस्थान - जहाँ धार्मिक प्रवचन आयोजित होते हैं।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर के दर्शन और पूजन का समय

अगर आप इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना चाहते हैं तो आपको बता दें कि त्र्यंबकेश्वर मंदिर सुबह 5:30 बजे खुलता है और रात 9:00 बजे बंद हो जाता है।

  • रुद्राभिषेक का समय: सुबह 7:00 बजे से 8:30 बजे तक।

  • भक्तों को 5 मीटर की दूरी से सामान्य दर्शन की अनुमति है।

  • केवल विशेष पूजा करने वाले पुरुषों को ही आंतरिक गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति है।

निष्कर्ष

इस स्थान की धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता अतुलनीय है। त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कौन सी जानकारी आप प्राप्त करना चाहते हैं ये हमें comment section में बताएँ और subscribe करें भारत माता चैनल