मीनाक्षी अम्मन मंदिर, मदुरै |मीनाक्षी अम्मां मंदिर का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व
धर्म और भारतीय संस्कृति का संबंध
पौराणिक काल से ही धर्म ने मानव को सत्य की राह पर ले जाने और मार्गदर्शन करने का कार्य किया है।
भारत में हजारों छोटे-बड़े मंदिर हैं, जो सनातन धर्म में भगवान के प्रति श्रद्धा और आस्था को दर्शाते हैं। इतना ही नहीं, जीवन की कठिनाइयों से लड़ने के लिए मानसिक शक्ति और ऊर्जा भी हमें मंदिरों से प्राप्त होती है। भारत के प्रसिद्ध प्रवचन पढ़ें
भारत के विशाल मंदिरों में मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर
दक्षिण भारत के प्राचीन व विशाल मंदिरों में से एक मंदिर ,जो तमिलनाडु राज्य के , मदुरई नगर में मीनाक्षी सुंदरेश्वर या मीनाक्षी अम्मां मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर पांड्य काल के शासन के दौरान बनाया गया मंदिर है जो की मदुरई शहर के केंद्र में स्थित है। इस मंदिर के चारों और कमल की आकृति में मदुरई शहर बसा है। यह मंदिर राजयश्री वाश्तु कला , जटिल नक्काशी , सुन्दर पेंट , उत्कृष्ट मूर्तियों का एक सुनहरा उदाहरण है। और मंदिर से जुड़ा प्राचीन महत्वपूर्ण पौराणिक तथ्य इस मंदिर को दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले मंदिरों की श्रेणी में लेकर आता है। सनातन संस्कृति और मंदिरों से जुड़ी रोचक जानकारियां
मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर का ऐतिहासिक महत्व
- यह 2500 वर्ष पुराना मंदिर है और मदुरई शहर के केंद्र में स्थित है।
- मंदिर का परिसर 17 एकड़ में फैला हुआ है, जिसमें 4500 खंभे, 14 टॉवर और एक पवित्र जल कुंड मौजूद है।
- मदुरई शहर को शिवलिंग के चारों ओर स्थापित किया गया है, जिससे इस मंदिर का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
यह मंदिर 2500 वर्ष पुराना है। मदुरई शहर को शिवलिंग के चारों ओर स्थापित किया गया है। पांच प्रवेश द्वार वाला यह विशाल मंदिर परिसर 17 एकड़ तक फैला है जिसमें 4500 खंभे तथा 14 टॉवर व पवित्र जल कुंड उपस्थित है। मीनाक्षी अम्मां या मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर का महान पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है। ये माना जाता है कि भगवान शिव ने सुंदरेश्वर रूप में मीनाक्षी रूप में अवतरित, माता पार्वती से विवाह किया था,और जिस स्थान पर उन्होंने विवाह किया वर्तमान में वहां पर मंदिर स्थित है। ये मंदिर दक्षिण भारत के मुख्य आकर्षणों में से एक है जहां हर दिन हजारों भक्त इसका दर्शन करने दूर दूर से आते है।
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
राजा मलयध्वज और देवी मीनाक्षी की जन्म कथा
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पाण्ड्य राजा मलयध्वज और रानी कंचनमलाय की कोई संतान नहीं थी। राजा मलय ध्वज व रानी कंचनमलायी की कोई संतान न थी। इसलिए राजा ने भगवान शिव से उन्हें पुत्र प्राप्त करने की कामना की। जिसके बाद एक यज्ञ के पुण्य स्वरूप राजा को कन्या प्राप्ति हुई जो की शारीरिक रूप से असामान्य थी। कन्या की इस असामान्य स्थिति पर राजा और उनकी पत्नी ने अपनी चिंता व्यक्त की, तो भगवान शिव ने स्वयं राजा के सपने में आ कर उन्हें लड़की की शारीरिक स्थिति पर ध्यान न देने का आदेश दिया। और कहा जब कन्या अपने भावी पति से मिलेगी तो स्वयं सामान्य हो जायेगी। कन्या की बड़ी और सुन्दर आँखों की वजह से राजा ने उसका नाम मीनाक्षी रखा और कुछ ही समय ने उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
- कहा जाता है कि मीनाक्षी शारीरिक रूप से असामान्य थीं, लेकिन भगवान शिव के आदेश के अनुसार, जब वे अपने भावी पति से मिलेंगी, तो वे सामान्य हो जाएंगी।
- मीनाक्षी ने मदुरई पर शासन किया और कई पड़ोसी राज्यों को अपने अधीन कर लिया।
- उन्होंने इंद्रलोक पर विजय प्राप्त करने के बाद कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान किया, जहां भगवान शिव के दर्शन से उनकी स्थिति सामान्य हो गई।
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भगवान शिव और मीनाक्षी का विवाह
- मीनाक्षी और भगवान शिव की शादी मदुरई में हुई, जिसे "तिरु कल्याणम" या चिथिरायी उत्सव के रूप में हर वर्ष धूमधाम से मनाया जाता है।
- इस विवाह समारोह में भगवान विष्णु ने स्वयं माता पार्वती का कन्यादान किया।
भगवान शिव के निवास स्थान को भी अपने अधीन करने कैलाश पहुंची। जब भगवान शिव उनके सामने आये तो मीनाक्षी की शारीरिक स्थिति सामान्य हो गयी। जिसके बाद उन्हें यह ज्ञात हो गया की शिव ही उनके पति है और वह दोनों मदुरई लौट आये।
मदुरई आकर भगवान शिव और मीनाक्षी का विवाह हुआ इस विवाह ने सभी देवी देवता आये क्योंकि माता पार्वती ने ही मीनाक्षी रूप में भगवान शिव से विवाह किया था। और स्वयं भगवान विष्णु ने माता पार्वती का कन्यादान किया था। आज भी इस शादी समारोह को हर साल चिथिरायी के रूप में मनाया जाता है जिसे तिरु कल्याणम या भव्य विवाह के रूप में भी जाना जाता है। यह त्यौहार मदुरई में अप्रैल के महीने में बड़े पैमाने में मनाया जाता है।
एक अन्य कथा के अनुसार...
- कहा जाता है कि भगवान इंद्र ने कदम वन में भगवान शिव के स्वयंभू लिंग की खोज की और उसे इस मंदिर में स्थापित किया।
- मंदिर परिसर में दो गर्भगृह हैं, जिनमें एक देवी मीनाक्षी को समर्पित है और दूसरा भगवान शिव को।
भगवान शिव के लिंग की खोज करने के बाद उन्होंने इस लिंग को मंदिर में स्थापित किया। मंदिर परिसर में दो प्रमुख गर्भग्रह स्थित है जिसमे से एक मीनाक्षी जिससे देवी पार्वती की अभिव्यक्ति तथा दूसरी भगवान शिव को समर्पित है।
सनातन संस्कृति का प्रचार-प्रसार
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