श्रीमद भगवद गीता अध्याय 4 | ज्ञान कर्म संन्यास योग | गीता ज्ञान श्रृंखला

श्रीमद भगवद गीता के चतुर्थ अध्याय में कर्म और ज्ञान का अद्भुत संतुलन

श्रीमद भगवद गीता के चतुर्थ अध्याय में कुल 42 श्लोक हैं, जिसमें भगवान श्री कृष्ण ने गूढ़ ज्ञान और कर्म के अद्भुत संतुलन को स्पष्ट किया है। इस अध्याय में श्री कृष्ण ने बताया कि भले ही मैं सृष्टि का कर्ता हूँ, परंतु मुझे "अकर्ता" के रूप में जानो। मेरा कर्मों में कोई आसक्ति नहीं है। इसीलिए, हमें मोक्ष की इच्छा जागृत होने पर भी कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए। यह संदेश बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कर्मों में भाग लेते हुए भी अगर हम अपनी संलिप्तता को मिटा दें, तो हम योग की ओर बढ़ सकते हैं।

कर्म को समर्पण के रूप में समझें

श्री कृष्ण ने बताया कि सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थों को अपना और अपने लिए न मानकर, उन्हें ईश्वर का और ईश्वर के लिए मानना, यही सच्चा यज्ञ है। यह 'मैं' के अहंकार को समाप्त कर देता है और आत्मा की शुद्धता की ओर मार्ग प्रशस्त करता है। इसी के द्वारा हम अपने कर्मों और संसार से जुड़ने के बजाय, उन्हें ईश्वर के लिए अर्पित कर देते हैं।

ज्ञानयज्ञ का महत्व

भगवान कहते हैं कि सभी द्रव्ययज्ञों में से ज्ञानयज्ञ सर्वोत्तम है, क्योंकि ज्ञान के माध्यम से हम कर्मों और पदार्थों से अपना संबंध तोड़ सकते हैं। इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए कर्मों का त्याग जरूरी नहीं है, क्योंकि यह तत्वज्ञान कर्मयोगी को अपने प्रत्येक कर्म में प्राप्त हो सकता है।

कर्म और ज्ञान का संगम - मोक्ष का मार्ग

श्रीमद भगवद गीता का यह अध्याय हमें यही सिखाता है कि जीवन में कर्म और ज्ञान का संगम ही मोक्ष का मार्ग है। श्री कृष्ण के अनुसार, 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे।।

यह श्लोक हमें बताता है कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का प्रादुर्भाव होता है, तब भगवान स्वयं अपनी योगमाया से इस संसार में प्रकट होते हैं। 

यह ज्ञान प्राप्ति की परंपरा

इसी प्रकार, यह ज्ञान एक अद्वितीय योग है जिसे पहले सूर्य ने प्राप्त किया, फिर वैवस्वत मनु और अंत में इक्ष्वाकु वंश के राजा ने। यह ज्ञान अत्यंत गूढ़ है, और इसे जानने के बाद ही हम जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझ सकते हैं। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि यह ज्ञान कर्मक्षेत्र में अभ्यास करते हुए भी प्राप्त किया जा सकता है।

कर्म योग और ज्ञान योग का महत्व

श्री कृष्ण यह भी बताते हैं कि मोक्ष प्राप्ति जीवन का परम लक्ष्य है, लेकिन ज्ञान को कर्म में बांधकर ही उसे सिद्ध किया जा सकता है। बिना कर्म किए ज्ञान की प्राप्ति अधूरी है। यही कारण है कि गीता का ज्ञान कर्म और योग के बीच संतुलन बनाए रखता है। कर्म का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन में कर्म, ज्ञान और भक्ति का समन्वय ही मोक्ष की दिशा में हमारा मार्गदर्शन करता है। जैसे पक्षी के दोनों पंख होते हैं, वैसे ही ज्ञान और कर्म के समन्वय से ही हम जीवन के उद्देश्य को पूरा कर सकते हैं।

अंत में, श्री कृष्ण के इन दिव्य उपदेशों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि कर्म योग और ज्ञान योग की संयुक्त साधना से ही जीवन में सच्चे मोक्ष की प्राप्ति होती है। हम सभी को इस ज्ञान को आत्मसात कर जीवन में उसे लागू करना चाहिए। श्रीमद भगवद गीता का यह ज्ञान कर्म संन्यास योग न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में शांति और संतुलन लाने का एक अद्वितीय मार्ग है। इस अध्याय के माध्यम से हमें यह सिखने को मिलता है कि अपने कर्मों को समर्पण के भाव से करना और ज्ञान के प्रकाश में उन्हें देखना ही सच्चा यज्ञ है। अतः, गीता के ज्ञान को जीवन में उतारें और ज्ञान कर्म संन्यास योग के मार्ग पर चलें।

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