श्रीमद भगवद गीता सार - अध्याय 5 | कर्म संन्यास योग | आसान शब्दों में गीता ज्ञान | Geeta Gyan Series
निष्काम कर्मयोग और संन्यास मार्ग
श्रीमद भगवत गीता के पाँचवे अध्याय में कुल 29 श्लोक हैं। इस अध्याय की शुरुआत में अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से प्रश्न किया कि आपने निष्काम कर्मयोग की प्रशंसा की है और कभी संन्यास मार्ग का भी उल्लेख किया है, तो दोनों में से कौन सा मार्ग परम कल्याणकारी है? श्री कृष्ण ने उत्तर दिया कि दोनों मार्ग ही कल्याणकारी हैं, लेकिन निष्काम कर्मयोग विशेष रूप से श्रेष्ठ है। क्योंकि संन्यास मार्ग में कर्मों का त्याग तो होता है, लेकिन निष्काम कर्मयोग बिना त्याग के ही ब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग प्रदान करता है। अधिक प्रवचनों के लिए देखें भारत माता का Pravachan संग्रह।
योगयुक्त संन्यासी की विशेषता
भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि कर्मयोग के बिना संन्यास संभव नहीं है, क्योंकि संन्यास मार्ग केवल एक भटकाव है, जबकि योगयुक्त संन्यासी ही वास्तविक सन्यासी है। योगयुक्त व्यक्ति के लक्षण बताते हुए श्री कृष्ण ने कहा कि जो साक्षात मुझे जान लेता है, वही ज्ञाता होता है।
यज्ञ और कर्म के साथ ईश्वर की प्राप्ति
यज्ञ के परिणामस्वरूप मुझे जानकर वे शांति प्राप्त करते हैं और उस शांति के द्वारा वे परमात्मा के साथ एकत्व का अनुभव करते हैं।
इस अध्याय में यह भी स्पष्ट किया गया कि यज्ञ का भोक्ता स्वयं महेश्वर हो जाता है। जब कोई व्यक्ति कर्मयोग में समर्पित होकर काम करता है, तो वह हर कर्म में भगवान के साथ एक हो जाता है। यही संन्यास का असली स्वरूप है, जो कर्म के साथ जुड़कर ही परम सत्य की प्राप्ति कर सकता है।
कर्म संन्यास योग का महत्व
गीता के पाँचवे अध्याय का नाम "कर्म संन्यास योग" इसलिए रखा गया है, क्योंकि इसमें कर्म और संन्यास दोनों के बीच के संबंध और उनके समन्वय का वर्णन किया गया है। इस अध्याय के पहले श्लोक में अर्जुन ने कर्मयोग और संन्यास योग के बारे में प्रश्न किया, और भगवान ने दूसरे श्लोक में इसका उत्तर देते हुए कहा कि दोनों ही कल्याणकारी हैं, लेकिन कर्मयोग को श्रेष्ठ माना है।
भगवान ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मयोग के बिना सांख्य योग का सिद्धांत कठिन है और कर्मयोग ब्रह्म की प्राप्ति का साधन है। इस अध्याय में ज्ञान और कर्म के समन्वय की बात की गई है, जिससे यह सिद्ध होता है कि केवल ज्ञान या केवल कर्म अधूरे हैं, दोनों का मेल ही जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने का मार्ग है।
जीवन के हर पहलू में कर्म योग का महत्व
इस अध्याय के अंत में भगवान श्री कृष्ण ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति सभी प्राणियों को एक परमात्मा का रूप मानता है, चाहे वह कुत्ता हो, चांडाल हो, हाथी हो, या ब्राह्मण हो, वह सबमें आत्मा की एकता को पहचानकर, लोक व्यवहार में रहते हुए कर्म करता है, वही सहज रूप से मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है। इस प्रकार श्री कृष्ण ने यह सिद्ध किया कि सांख्य और कर्मयोग में भेद दृष्टि रखने से निश्चित परिणाम की प्राप्ति नहीं होती। दोनों का समन्वय ही जीवन के वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करने का मार्ग है।
श्रीमद भगवत गीता का यह कर्म संन्यास योग अध्याय न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि जीवन के हर पहलू में शांति और संतुलन लाने का मार्ग है। इसे समझकर हमें अपने कर्मों को योग और ध्यान के साथ जोड़ते हुए परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग पर चलना चाहिए।
अतः, श्री कृष्ण के उपदेशों के अनुसार, कर्मयोग और संन्यास योग के संतुलन से हम जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पा सकते हैं। इस अध्याय के सार को समझकर, हम अपने जीवन को दिव्य मार्ग पर चला सकते हैं।
भारत माता द्वारा प्रस्तुत गीता ज्ञान श्रंखला के अगले भाग में हम और भी गीता के अध्यायों के सार को समझेंगे। जुड़े रहें भारत माता चैनल के साथ!
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