श्रीमद भगवद गीता अध्याय 9 | राज विद्या योग | गीता का सार आसान शब्दों में | Geeta Gyaan Series
भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता में दी गई शिक्षा
भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता में दी गई शिक्षा का प्रत्येक अध्याय एक अद्भुत संदेश और गूढ़ ज्ञान से परिपूर्ण है। इसके पूर्व के अध्यायों में हमने अनेक योगों और उनके महत्व को समझा। आज हम गीता के नौवें अध्याय "राजविद्या राजगुह्यं योग" की व्याख्या करेंगे, जो विशेष रूप से एक दिव्य और रहस्यमय विद्या से संबंधित है।
राजविद्या और राजगुह्यं योग का परिचय
इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से एक गूढ़ ज्ञान साझा किया, जिसे "राजविद्या" और "राजगुह्यं" कहा गया है। यह ज्ञान सामान्य ज्ञान से कहीं अधिक गहरा और शक्तिशाली है, और इसे प्राप्त करने के लिए ईश्वर के प्रति अपार भक्ति और आस्था की आवश्यकता होती है।
राजविद्या और राजगुह्यं का अर्थ
राजविद्या और राजगुह्यं का अर्थ है "राजा की विद्या और राजा का गोपनीय ज्ञान"। भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि यह ज्ञान अत्यंत पवित्र, महान और सर्वोत्तम है। यह ज्ञान न केवल आत्मज्ञान के रूप में व्यक्त होता है, बल्कि यह हमारे जीवन में दिव्य शक्ति का संचार भी करता है।
भगवान श्री कृष्ण का दिव्य स्वरूप
इस विद्या का वास्तविक स्वरूप भगवान के दिव्य रूप को जानना और समझना है। भगवान श्री कृष्ण स्वयं इस ज्ञान को जाग्रत करते हैं और यह ज्ञान एक बार जागृत होने के बाद व्यक्ति के जीवन में स्थायी कल्याण लाता है।
भगवान का ब्रह्मांडीय स्वरूप
श्री कृष्ण ने इस अध्याय में यह भी बताया कि:
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वे ही यज्ञ हैं,
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वे ही औषधियाँ हैं,
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वे ही मंत्र हैं,
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वे ही समस्त वेदों में समाहित हैं।
इस प्रकार, भगवान श्री कृष्ण ने यह स्पष्ट किया कि पूरे ब्रह्मांड का तात्त्विक और आध्यात्मिक स्वरूप वे स्वयं हैं।
भक्ति का महत्व
भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि भक्ति के माध्यम से वे सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं। जब कोई व्यक्ति अपने कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित कर देता है और निरंतर उनकी भक्ति करता है, तो भगवान उसके सारे कर्मों को सवार देते हैं और उसे संसार के बंधनों से मुक्त कर देते हैं।
भगवान की भक्ति से मुक्ति
यह अध्याय हमें यह भी सिखाता है कि मनुष्य को अपने जीवन में केवल भक्ति को ही प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि भगवान की भक्ति से ही जीवन के सभी कष्टों और दुखों से मुक्ति मिलती है।
भगवान ही समस्त कर्मों के आधार
भगवान श्री कृष्ण ने यह भी बताया कि इस संसार में सभी कर्मों का आधार भगवान हैं। वे स्वयं कर्मों के कर्ता हैं, वे ही यज्ञ हैं, वे ही घृत और औषधि हैं। श्री कृष्ण ने यह स्पष्ट किया कि यह ज्ञान केवल उन लोगों को प्राप्त होता है, जो उनके प्रति पूर्ण श्रद्धा और भक्ति रखते हैं।
भगवान में समर्पण का महत्व
भगवान श्री कृष्ण ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति उन्हें अपने मन और आत्मा से समर्पित करता है, वह उनके साथ एकाकार हो जाता है और उसका जीवन सफल हो जाता है।
भगवान की भक्ति का सर्वोच्च महत्व
अध्याय के अंत में भगवान श्री कृष्ण ने यह बताया कि भगवान की भक्ति ही सबसे सरल और प्रभावी तरीका है, जिससे मनुष्य अपने जीवन में शांति और सुख पा सकता है। श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि वह निरंतर उनकी भक्ति करता रहे और उन्हें समर्पित कर अपना हर कर्म उनके नाम से करे।
भगवान के आशीर्वाद की प्राप्ति
इस प्रकार, अर्जुन को भगवान का साक्षात्कार और उनका आशीर्वाद प्राप्त होगा। यह अध्याय हमें भक्ति मार्ग का महत्व सिखाता है और आत्मज्ञान प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है।
निष्कर्ष
राजविद्या राजगुह्यं योग हमें यह सिखाता है कि भगवान के दिव्य ज्ञान के माध्यम से हम अपने जीवन के सभी कष्टों और दुखों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। यह ज्ञान केवल उनके प्रति भक्ति और विश्वास से ही प्राप्त होता है। हमें अपने जीवन में भगवान की भक्ति को सर्वोत्तम मानते हुए उनके मार्गदर्शन का अनुसरण करना चाहिए। इस प्रकार, गीता का यह नौवां अध्याय हमें आत्मज्ञान, ईश्वर के प्रति भक्ति और सच्चे योग की महिमा से परिचित कराता है।
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