Chand Bardai | प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो लिखने वाले महाकवि चंदबरदाई | Author of Prithviraj Raso

“ चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
  ता ऊपर सुल्तान है, चूको मत चौहान।।”

हिंदी साहित्य के आदिकालीन कवि ‘चंदबरदाई’ ने उपयुक्त दोहे का वाचन रण-भूमि पर किया था, जिसे सुनकर उनके मित्र पृथ्वीराज चौहान ने ग़जनी को शब्दवेधी बाण से घायल कर दिया था।

चंदबरदाई का जन्म और प्रारंभिक जीवन

इनके जन्म को लेकर अनेक किम्विदंतियाँ प्रचलित हैं, कुछ लोग इनका जन्म वर्ष 1205 मानते हैं तो कुछ विद्वानों के अनुसार सन 1148 में लाहौर में इनका जन्म हुआ था। मान्यता यह भी है की चंदबरदाई और उनके परम मित्र पृथ्वीराज चौहान का जन्म व प्राणांत एक ही दिन हुआ था। चंदबरदाई का वास्तविक नाम ‘बलिद्ध्य’ था। इनके पिता अजमेर के चौहानों के पुरोहित थे। यही कारण है की राजकुल से इनका सदैव संपर्क रहा। चंद बाल्यकाल से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे। दिल्ली-अजमेर के सुविख्यात नरेश पृथ्वीराज से मित्रता होने के कारण, चंदबरदाई ने अपना अधिकाँश जीवन दिल्ली में ही व्यतीत किया। राजधानी से लेकर युद्ध क्षेत्र तक ये हर स्थान पर पृथ्वीराज के साथ ही रहते थे। चंद न केवल सम्राट पृथ्वीराज के मित्र थे परन्तु साथ ही उनके दरबार में एक सामंत तथा राजकवि के रुप में प्रसिद्ध थे।

महाकाव्य: पृथ्वीराज रासो | चंदबरदाई की साहित्यिक योगदान | The Epic Poem: Prithviraj Raso

 

पृथ्वीराज के प्रति अपने प्रेम के चलते चंदबरदाई ने हिंदी भाषा के प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो की रचना की। 'पृथ्वीराज रासो' को हिंदी का सबसे बड़ा काव्य-ग्रंथ माना जाता है।

'पृथ्वीराज रासो' को हिंदी की पहली रचना होने का सम्मान भी प्राप्त है। इसमें चंद ने पृथ्वीराज के जीवन की अनेक घटनाओं का उल्लेख किया। इसमें प्रमुख रूप से वीर और श्रृंगार दो रस सम्मिलित हैं। इस महाकाव्य में संकलित प्रत्येक घटना पृथ्वीराज के जीवन व चरित्र की प्रस्तुति करती है। यह महाकाव्य ढ़ाई हजार पृष्ठों का विशाल ग्रंथ है। इसमें कुल उनहत्तर अध्याय हैं। इस महाकाव्य में 10,000 से अधिक छंद हैं और उस समय की प्रचिलत 6 भाषाओं का उपयोग किया गया है। ग्रथं में उत्तर भारत के राजपूत समाज की जीवन शैली और परंपराओं में विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है। प्राचीन समय में प्रचलित प्रायः सभी छंदों का इसमें व्यवहार हुआ है। चंद को ‘छप्पय’ छंद का विशेषज्ञ माना जाता है।
रासो के अनुसार जब शहाबुद्दीन गोरी पृथ्वीराज को बंदी बनाकर ग़ज़नी ले गया, तब कुछ दिनों पश्चात् चंद भी वहीं गए। जाते समय कवि ने अपने पुत्र जल्हण के हाथ में रासो की पुस्तक देकर उसे पूर्ण करने का संकेत किया। जल्हण के हाथ में रासो को सौंपे जाने और उसके पूरे किए जाने का उल्लेख रासो में है -

पुस्तक जल्हण हत्थ दै चलि गज्जन नृपकाज।
रघुनाथनचरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्धरिय जिमि।
पृथिराजसुजस कवि चंद कृत चंदनंद उद्धरिय तिमि॥

चंदबरदाई: ऐतिहासिक संदर्भ और सांस्कृतिक प्रभाव

महाकवि चंद षडभाषा, व्याकरण, काव्य, छंदशस्त्र, साहित्य, ज्योतिष, पुराण, नाटक, आदि विषयों में अति निपुण थे। ये आदृष्ट काव्य रचने में भी पारंगत थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ग्रन्थ 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में लिखा है- चंदबरदाई ये हिन्दी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका पृथ्वीराज रासो हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। 

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