होलिकोत्सव - होलिका दहन एवं होली की कहानी | वसंत ऋतु की सन्देश वाहक | Holi Story|Bharat Mata

जिस देश की मिट्टी में वीरता का केसरिया रंग मिला हो.. जिस देश में हरियाली से भरे हुए खेत-खलिहान हों.. अमन तथा शान्ति की नीली चादर से ढका हुआ वो देश.. जिसका गौरवशाली इतिहास श्वेत वर्ण की भांति.. निष्कलंक तथा पवित्र हो.. वो देश केवल भारत ही हो सकता है। 

सम्पूर्ण विश्व में भारत ही ऐसा देश है.. जिसने ‘अनेकता में एकता’ को परिभाषा तथा वास्तिविकता प्रदान की है। भारत में विभिन्न धर्मों तथा संप्रदायों के मनोहर रंग.. एक साथ मिलकर भारतीयता रुपी अद्वितीय इन्द्रधनुष का आकार धारण कर लेते हैं। 

रंगों से भरे हुए इस देश में.. रंगों का त्यौहार ‘होली’.. आनंद के रंग बिखेरता हुआ.. अत्यंत हर्षोल्लास से मनाया जाता है। उमंग तथा उत्साह का त्यौहार.. होली.. हिन्दू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। हिन्दू पंचांग के अनुसार.. होली का त्यौहार प्रतिवर्ष फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।  होली.. पारम्परिक रूप से दो दिवसीय त्यौहार है.. जिसमें होलिका दहन एवं धुलेंदी.. धूलि तथा धूलिवंदन मनाया जाता है। 

प्रेम एवं सद्भावना का संचार करने वाली होली.. वसंत ऋतु की संदेशवाहक भी है। वसंत ऋतु में वातावरण में व्याप्त रंग-बिरंगी छटा को ही रंगों से खेलकर.. वसंत उत्सव होली के रूप में दर्शाया जाता है। वसंत ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण.. होली को वसंतोत्सव तथा काम-महोत्सव भी कहा गया है।

इतिहास तथा काल की दृष्टि से.. होली अत्यंत प्राचीन त्यौहार है.. जिसका वर्णन जैमिनि के पूर्वमिमांसा सूत्र तथा काठकग्रहय सूत्र में भी है। प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध होली का आरंभिक शब्दरूप होलाका था। जैमिनि एवं काठकगृह्य में वर्णित होने के कारण यह कहा जा सकता है कि ईसा की कई शताब्दियों पूर्व से 'होलाका' का उत्सव प्रचलित था। नारद पुराण तथा भविष्य पुराण आदि पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों एवं ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख प्राप्त होता है। वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके.. प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला भी कहा जाता है.. इसी कारण से इस पर्व को होलिकोत्सव की संज्ञा प्राप्त है। प्राचीन भारत के मंदिरों में भी होली से सम्बंधित कई मूर्तियां तथा चित्र दृष्टव्य हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों तथा आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं।  

वसंत आगमन के उत्साह तथा प्रेम के भाव से समाहित होली.. प्राचीन काल के समान.. वर्तमान में भी प्रसन्नता तथा उल्लास की द्योतक है। यद्यपि समय के साथ.. रंगों की परिभाषा में परिवर्तन हुआ है। जहाँ प्राचीन काल में होली के रंग.. पलाश अथवा टेसू के पुष्प से निर्मित होते थे.. जिन्हें गुलाल कहा जाता था.. वहीं वर्तमान में.. गुलाल के अतिरिक्त.. रासानियक रंगों का भी प्रयोग किया जाता है। होली के स्वरुप में भले ही परिवर्तन हुआ हो.. किन्तु होली का आत्मिक भाव आज भी गंगा के समान पवित्र तथा भारतीय संस्कृति के समान प्रेममय है। ये पर्व केवल रंग ही नहीं.. नृत्य एवं संगीत के द्वारा भी आनंद की अभिव्यक्ति का माध्यम है।  प्रमुख रूप से भारत तथा नेपाल में मनाया जाने वाला ये पर्व.. सम्पूर्ण विश्व में अपने अद्भुत राग-रंग के लिए अतिप्रसिद्ध है।

होली से सम्बंधित कई ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाएँ हैं। मान्यता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक बलशाली असुर था.. जो भगवान विष्णु का घोर विरोधी था। किन्तु हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद.. भगवान विष्णु का परम भक्त था। अनन्य प्रयासों के पश्चात् भी जब हिरण्यकश्यप.. प्रह्लाद को ईश्वर भक्ति के मार्ग से विमुख नहीं कर सका.. तब उसने अपनी बहन होलिका को.. प्रह्लाद को गोद में लेकर.. अग्नि में बैठने का आदेश दिया। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसके शरीर को भस्म नहीं कर सकती। श्री हरि विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद का वध करने के प्रयोजन से.. होलिका उसे अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई.. किन्तु प्रह्लाद की भक्ति के प्रताप तथा श्रीहरि विष्णु की कृपा के परिणामस्वरूप.. स्वयं होलिका अग्नि में भस्म हो गई और उस अग्नि से प्रह्लाद सुरक्षित रूप से बाहर आ गए। ईश्वरीय कृपा तथा भक्ति के महत्त्व की इस घटना को होलिका दहन के रूप में मनाया जाता है.. जिसमें वैर तथा उत्पीड़न की प्रतीक होलिका जलती है तथा भक्ति.. प्रेम एवं उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद अक्षुण्ण रहता है।

एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार.. भगवान कृष्ण रंगों से होली मनाते थे.. जिस कारण से होली का त्यौहार.. रंगों के त्यौहार के रूप में लोकप्रिय हुआ। आज भी वृंदावन में मनाई जाने वाली अद्भुत होली के समान होली और कहीं दृष्टव्य नहीं है। एक अन्य कथा के अनुसार.. भगवान श्रीकृष्ण ने पूतना नामक भयानक राक्षसी का वध किया था। पूतना के भय तथा आतंक की समाप्ति पर.. गोपियों और ग्वालों ने रंगों से होली मनायी थी। इस प्रकार होली का पर्व.. दुर्भावना तथा द्वेष पर सद्भावना तथा प्रेम की विजय का प्रतीक है।

होली का उत्सव.. देश के विभिन्न भागों में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। बंगाल और ओडिशा में मनाई जाने वाली होली.. 'डोल पूर्णिमा' में.. राधा-कृष्ण की प्रतिमा को डोल में बैठा कर.. भजन कीर्तन करते हुए यात्रा निकाली जाती है और रंगों से होली खेली जाती है। तमिलनाडु में होली को 'कमाविलास'.. 'कमान पंदिगाई' एवं 'काम-दहन' कहा जाता है। आंध्रप्रदेश की बंजारा जनजाति.. अपनी विशिष्ट शैली में मनोरम नृत्य प्रस्तुत करते हुए.. होली मनाती है। गुझिया.. दही वड़े.. मठरी तथा ठंडाई का स्वाद.. गुलाल तथा रंगों से भरी पिचकारी और आनंद एवं उत्साह से भरी चुहल.. उत्तरप्रदेश की होली की विशेषता है। “सब जग होरी या ब्रज होरा” अर्थात सारे जग से अनूठी ब्रज की होली है। ब्रज के ग्राम बरसाना में होली को प्रेम का प्रतीक माना जाता है। इस विश्वप्रसिद्ध ‘लट्ठमार होली’ में श्रीकृष्ण के निवास स्थान.. नंदगांव से पुरुष और राधा की निवास स्थली.. बरसाना से महिलाएं भाग लेती हैं। मथुरा एवं वृन्दावन की होली की अद्भुत छटा का आनंद प्राप्त करने के लिए.. असंख्य श्रद्धालु एवं पर्यटक यहाँ होली मनाने आते हैं। महाराष्ट्र और गुजरात में.. श्री कृष्ण की बाल लीला का स्मरण करते हुए होली का पर्व मनाया जाता है। महिलाएं मक्खन से भरी मटकी को ऊँचाई पर टांगती हैं.. जिन्हें पुरुष फोड़ने का प्रयास करते हैं तथा गीत-संगीत के साथ होली खेलते हैं। पंजाब की ‘होला मोहल्ला’ और राजस्थान की ‘माली-होली’ और ‘डोलची-होली’ अपनी भव्यता के लिए विख्यात है।

हास-परिहास तथा प्रेम एवं हर्ष का पर्व – होली.. भेद-भाव.. वैमनस्यता.. ईर्ष्या-द्वेष की नकारात्मक भावना का त्याग करके.. सकारात्मक उर्जा से ओतप्रोत जीवन का भाव है। “बुरा न मानो.. होली है..” का परिहास.. वास्तव में जीवन का वो सूत्र है.. जो जीवन में व्यथित करने वाली नकारात्मक घटनाओं एवं बाधाओं से स्वयं को विरक्त करते हुए.. सकारात्मक रूप से जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा प्रदान करता है।

Bharat Mata परिवार की ओर से.. आप सभी को.. सुख.. समृद्धि एवं हर्ष के प्रतीक पर्व – होली की हार्दिक शुभकामनाएं।

 

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