वापस जाएं

उत्तराखंड के 8 चमत्कारी देवी मंदिर | Uttarakhand Devi Mandir | Devbhoomi Shakti Peeth

यह है — उत्तराखंड। देवभूमि। देवों की भूमि।

उत्तराखंड के प्रसिद्ध देवी मंदिर — देवभूमि की दिव्य शक्तिपीठें

हिमालय की गोद में बसी यह पावन धरती सदियों से ऋषियों, मुनियों और साधकों की तपस्थली रही है। लेकिन इस देवभूमि उत्तराखंड की सबसे दिव्य विरासत है — यहाँ की शक्तिपीठें और देवी मंदिर

उत्तराखंड के प्रसिद्ध देवी मंदिर वे पवित्र स्थान हैं जहाँ माँ की कृपा से हर मनोकामना पूरी होती है, हर पीड़ा दूर होती है, और हर आत्मा को परम शांति मिलती है। आइए चलें — देवभूमि उत्तराखंड के दिव्य शक्तिपीठों के दर्शन करने।

नंदा देवी मंदिर उत्तराखंड — उत्तराखंड की कुलदेवी

7,816 मीटर की ऊँचाई पर खड़ी नंदा देवी की चोटी केवल एक पर्वत नहीं है — यह उत्तराखंड की आत्मा है। यह माँ नंदा का घर है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, माँ नंदा पार्वती का ही एक रूप हैं। शिव-पार्वती की पुत्री के रूप में उत्तराखंड की जनता उन्हें अपनी "घर की बेटी" मानती है। देवी भागवत में उनका उल्लेख आठ सिद्धियों की देवी के रूप में है।

प्रत्येक 12 वर्षों में एक बार होने वाली नंदा राज जात यात्रा विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक है। यह 280 किलोमीटर की पदयात्रा नौटी गाँव से आरम्भ होकर हिमालय के रूपकुंड होते हुए होमकुंड तक जाती है — जहाँ माँ नंदा को विदाई दी जाती है।

माँ नंदा उत्तराखंड की कुलदेवी हैं। समस्त गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र में उनकी पूजा होती है। नैनीताल नंदा देवी मंदिर, अल्मोड़ा नंदा देवी मंदिर और चमोली नंदा देवी मंदिर — ये सभी माँ की उपस्थिति के जीवंत प्रमाण हैं।

सुरकंडा देवी मंदिर टिहरी — 51 शक्तिपीठों में से एक

टिहरी गढ़वाल जिले में 2,757 मीटर की ऊँचाई पर स्थित सुरकंडा देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह किया, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए ताकि शिव जी के शोक को कम किया जा सके। जहाँ-जहाँ ये अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ बने।

सुरकंडा देवी में माता का "सिर" गिरा था — इसीलिए इस स्थान का नाम "सुरकंडा" पड़ा, जिसका अर्थ है "देवी का मस्तक"।

सुरकंडा देवी मंदिर से हिमालय की अनेक चोटियाँ दिखती हैं — केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्रीगंगा दशहरा के अवसर पर यहाँ विशाल मेला लगता है जिसमें लाखों श्रद्धालु आते हैं।

चंद्रबदनी देवी मंदिर — उत्तराखंड के तीन प्रमुख शक्तिपीठों में से एक

टिहरी गढ़वाल में ही स्थित है चंद्रबदनी देवी का प्राचीन मंदिर — जो उत्तराखंड के तीन प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है।

इस स्थान पर माता सती का "धड़" गिरा था — इसीलिए यह स्थान "बदनी" अर्थात् "देह" से जुड़ा है। सुरकंडा देवी (सिर), कुंजापुरी देवी और चंद्रबदनी देवी — ये तीनों मिलकर टिहरी की त्रिकोणीय शक्ति बनाती हैं।

पुराणों में वर्णित है कि इस स्थान पर माँ ने "चंद्र" अर्थात् चंद्रमा की भी आराधना की थी — इसीलिए इस देवी को "चंद्रबदनी" कहा जाता है।

2,277 मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस मंदिर में माता की मूर्ति नहीं बल्कि "श्री यंत्र" की पूजा होती है — जो शक्ति का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है।

नवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष पूजा होती है और हज़ारों श्रद्धालु पैदल चलकर माता के दर्शन करने आते हैं।

धारी देवी मंदिर उत्तराखंड — चार धाम यात्रा की संरक्षिका

अलकनंदा नदी के बीच एक चट्टान पर विराजमान — धारी देवी।

उत्तराखंड की रक्षक, चार धाम यात्रा के यात्रियों की संरक्षिका, और श्रीनगर की कुलदेवी — माँ धारी देवी मंदिर अपनी रहस्यमयी कथाओं और चमत्कारी इतिहास के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

कथा है कि माँ धारी देवी की मूर्ति अलकनंदा नदी में बही आई थी और स्थानीय लोगों ने उन्हें यहाँ स्थापित किया। यह भी मान्यता है कि माँ की मूर्ति दिन में तीन बार अपना रूप बदलती है — सुबह बालिका, दोपहर युवती और सायंकाल वृद्धा स्वरूप में दिखती हैं।

2013 में जब केदारनाथ आपदा आई, उससे ठीक कुछ घंटे पहले माँ धारी देवी की मूर्ति को श्रीनगर बाँध परियोजना के लिए उनके मूल स्थान से हटाया गया था। उसी रात केदारनाथ में महाप्रलय आई। लोग कहते हैं — जब माँ का आसन हिला, तो उत्तराखंड को भी आघात लगा।

यह संयोग था या चमत्कार — यह तो माँ ही जानती हैं। लेकिन इस घटना ने माँ धारी देवी की महिमा को और गहरा कर दिया।

नैना देवी मंदिर नैनीताल — जहाँ सती के नयन गिरे थे

नैनीताल — जहाँ पहाड़ों के बीच एक सुंदर झील है, और उसी झील के किनारे विराजमान हैं — माँ नैना देवी

पौराणिक मान्यता के अनुसार इस स्थान पर माता सती की "आँखें" (नयन) गिरी थीं — इसीलिए इस शहर का नाम "नैनीताल" पड़ा।

वर्तमान नैना देवी मंदिर नैनीताल का निर्माण 19वीं सदी में हुआ था। 1880 में नैनीताल में आई एक भीषण भूस्खलन आपदा में मंदिर को क्षति पहुँची थी, लेकिन माँ की मूर्ति सुरक्षित रही — यह स्वयं एक चमत्कार था।

नैना देवी मंदिर में माँ दुर्गा, माँ काली और भगवान गणेश की भी प्रतिमाएँ हैं। नवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष आयोजन होते हैं।

कसार देवी मंदिर अल्मोड़ा — जहाँ विज्ञान और आस्था मिलते हैं

अल्मोड़ा से मात्र 8 किलोमीटर दूर स्थित कसार देवी मंदिर दूसरी शताब्दी ईस्वी से भी पुराना माना जाता है। माँ कसार देवी शक्ति की एक स्वयंभू अभिव्यक्ति हैं — यहाँ कोई मूर्ति नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक शिलाखंड ही देवी का स्वरूप है।

स्वामी विवेकानंद ने भी इस स्थान पर ध्यान किया था। बाद में 1960-70 के दशक में यह स्थान "Crank's Ridge" के नाम से प्रसिद्ध हुआ जब विदेशी आध्यात्मिक साधक यहाँ ध्यान और मोक्ष की खोज में आने लगे।

NASA के वैज्ञानिकों ने पाया है कि कसार देवी एक "Van Allen Belt" पर स्थित है — यानी यहाँ पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र असाधारण रूप से शक्तिशाली है। विश्व में केवल तीन ऐसे स्थान हैं जहाँ यह विशेष भू-चुम्बकीय क्षेत्र (electromagnetic energy zone) है — पेरू का माचू पिच्चू, ब्रिटेन का स्टोनहेंज, और अल्मोड़ा का कसार देवी

हमारे ऋषियों ने हज़ारों वर्ष पहले जिसे "शक्ति का स्थान" कहा — आज विज्ञान उसे "electromagnetic energy zone" कह रहा है।

कसार देवी दीपावली मेला विशेष रूप से प्रसिद्ध है। नवरात्रि में यहाँ विशेष पूजन होता है। यह स्थान ध्यान, योग और आत्मानुसंधान के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है।

मनसा देवी मंदिर हरिद्वार — हरिद्वार तीर्थ यात्रा का अनिवार्य पड़ाव

हरिद्वार — गंगा के किनारे बसी यह पावन नगरी, जहाँ हर शाम गंगा आरती से आकाश जगमगाता है — वहाँ शिवालिक पर्वत की गोद में विराजमान हैं — माँ मनसा देवी हरिद्वार

माँ मनसा देवी को शिव पुराण में नागराज वासुकि की पुत्री बताया गया है। कुछ पुराणों में उन्हें शिव की मानस पुत्री भी कहा गया है — अर्थात् मन से उत्पन्न शक्ति। देवी भागवत में उन्हें आदिशक्ति के 108 रूपों में से एक माना गया है। माँ मनसा देवी नागों की स्वामिनी मानी जाती हैं और इसीलिए उनके साथ नाग की पूजा का भी विधान है।

मनसा देवी मंदिर में माँ की पंचमुखी मूर्ति विराजमान है और उनके साथ भगवान गणेश तथा माँ लक्ष्मी की प्रतिमाएँ भी हैं। माँ के तीन रूप माने जाते हैं — सिद्धिदात्री (सिद्धियाँ देने वाली), जगदंबा (संसार की माता), और विषहरिणी (विष हरने वाली)।

मान्यता है कि कुंभ मेला हरिद्वार स्नान से पहले माँ का आशीर्वाद लेने से पुण्य का फल कई गुना हो जाता है।

नवरात्रि, नाग पंचमी और जन्माष्टमी में मंदिर में विशेष पूजा होती है। हरिद्वार तीर्थ यात्रा पर आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए माँ के दर्शन अनिवार्य माने जाते हैं। बिना माँ के आशीर्वाद के, हरिद्वार की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

उत्तराखंड — यह केवल एक राज्य नहीं है। यह माँ का आँचल है।

यहाँ की हर चोटी पर, हर नदी के किनारे, हर वन के भीतर — माँ किसी न किसी रूप में विराजमान हैं।

जय देवभूमि उत्तराखंड