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Lepakshi Temple Hanging Pillar | 500 साल पहले बिना मशीन के यह कैसे बनाया गया? | हवा में लटका खंभा

आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव में खड़ा है एक ऐसा मंदिर जो गुरुत्वाकर्षण को भी चुनौती देता है। एक स्तंभ जो हवा में लटका है। एक नंदी जो एक ही पत्थर से उकेरी गई है। और भित्तिचित्र जो पाँच सौ साल बाद भी जीवंत हैं। यह कहानी है श्री वीरभद्र मंदिर, लेपाक्षी की, जहाँ वास्तुकला कला से मिलती है और रहस्य आस्था से। ले पक्षी, उठो पक्षी, भगवान राम के ये शब्द आज भी यहाँ गूंजते हैं। चलिए खोलते हैं इस अद्भुत मंदिर के रहस्य।

रामायण से जुड़ा लेपाक्षी नाम का पौराणिक रहस्य

रामायण के उस युग में जब रावण सीता माता को हर कर ले जा रहा था, तब आकाश में एक महान युद्ध हुआ। जटायु, वह वीर पक्षी, जिसने सीता माता को बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। घायल जटायु धरती पर गिर पड़ा। जब भगवान राम यहाँ पहुँचे तो उन्होंने कहा, ले पक्षी, उठो पक्षी। इन्हीं शब्दों से इस स्थान को नाम मिला, लेपाक्षी।

आज भी यहाँ एक विशाल चट्टान पर जटायु की भव्य प्रतिमा खड़ी है, जो इस कथा को सजीव बनाती है।

विजयनगर साम्राज्य और वीरभद्र मंदिर का निर्माण इतिहास

सन् 1530 में विजयनगर साम्राज्य का स्वर्णिम युग था। राजा अच्युतराय के शासनकाल में विरुपन्ना और वीरन्ना राज्य के कोषाध्यक्ष थे। विरुपन्ना को भगवान शिव के उग्र रूप वीरभद्र की प्रतिमा स्थापित करने की दिव्य प्रेरणा मिली। राजा की अनुपस्थिति में विरुपन्ना ने राजकोष से धन लेकर इस भव्य मंदिर का निर्माण आरंभ किया। जब राजा लौटे और कोष खाली पाया तो क्रोध में विरुपन्ना को दंड दिया गया। किंवदंती है कि निर्दोष विरुपन्ना ने अपनी आँखें निकालकर मंदिर की दीवार पर फेंक दीं।
आज भी उस दीवार पर रक्त के निशान देखे जाते हैं और कल्याण मंडप अधूरा ही रह गया।

लटकता स्तंभ, एकाश्म नंदी और लेपाक्षी की अद्भुत कला

लेपाक्षी पहुँचते ही सबसे पहले आपका स्वागत करती है विश्व की सबसे विशाल एकाश्म नंदी प्रतिमा। सत्ताईस फीट लंबी और पंद्रह फीट ऊँची यह नंदी एक ही ग्रेनाइट पत्थर से तराशी गई है। मंदिर के भीतर सत्तर स्तंभों वाला नाट्य मंडप है, जिसमें एक अद्भुत आकाश स्तंभ है जो ज़मीन को स्पर्श नहीं करता। इसके नीचे से कपड़ा और कागज़ निकाले जा सकते हैं। ब्रिटिश काल में एक इंजीनियर द्वारा छेड़छाड़ करने पर पूरी संरचना हिलने लगी, जिससे कार्य तुरंत रोकना पड़ा।

छत पर एशिया का सबसे बड़ा भित्तिचित्र है, तेईस फीट गुणा तेरह फीट का, जिसमें वीरभद्र के चौदह अवतार दर्शाए गए हैं। खनिज और वनस्पति रंगों से बने ये चित्र पाँच सौ वर्षों बाद भी जीवंत हैं। मंदिर परिसर में नागलिंग है, सात फन वाला विशाल सर्प जो शिवलिंग को छाया देता है। स्कंद पुराण में लेपाक्षी को 108 दिव्य क्षेत्रों में से एक बताया गया है।

यहाँ प्रतिदिन मंगल आरती, रुद्राभिषेक और सायंकालीन आरती होती है। महाशिवरात्रि, उगादी और कार्तिका दीपावली यहाँ के प्रमुख उत्सव हैं, जब पूरा मंदिर दीपों से जगमगा उठता है। लेपाक्षी मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि भारतीय कला, वास्तुकला और आस्था का अनमोल खजाना है। यह विजयनगर, चालुक्य, होयसला और काकतीय कला परंपराओं का संगम है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया है।

आज लेपाक्षी अतीत और वर्तमान को जोड़ता है। यह मंदिर सिखाता है कि सच्ची कला समय से परे होती है, विश्वास पत्थरों में भी प्राण फूंक सकता है और रहस्य जीवन को रोचक बनाते हैं।

श्री वीरभद्र मंदिर, लेपाक्षी — विजयनगर साम्राज्य की शान, भारतीय वास्तुकला का रत्न और रहस्यों का घर।