मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग : दक्षिण का कैलाश | Shrisailam Temple | Mallikarjun Jyotirlinga Story
क्या आपने कभी सोचा है कि उस स्थान की ऊर्जा कैसी होगी, जहाँ महादेव और पार्वती, पुत्र मोह और वैराग्य के एक अद्भुत क्षण में साथ आए थे? कृष्णा नदी के किनारे, नल्लमला की पहाड़ियों के बीच छुपा है एक ऐसा रहस्य, जिसे ‘दक्षिण का कैलाश’ कहा जाता है। यहाँ पत्थर भी मंत्र जपते हैं और हवाओं में ‘ॐ नमः शिवाय’ की गूंज है। चलिए, आज चलते हैं मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की उस यात्रा पर, जहाँ मोक्ष मात्र एक शब्द नहीं, एक अनुभव है।
पौराणिक महत्व और कथा (Mythological Significance & Story)
पुराणों से हमें पता चलता है कि यह स्थल केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था का केंद्र बिंदु है। जब शिव-पुत्र कार्तिकेय और गणेश के बीच विवाह की होड़ लगी, तब माता-पिता की परिक्रमा कर गणेश विजयी हुए। क्रोधित कार्तिकेय क्रौंच पर्वत पर चले गए। उन्हें मनाने के लिए स्वयं महादेव और माता पार्वती यहाँ पधारे। शिव ‘अर्जुन’ बने और पार्वती ‘मल्लिका’। और इसी मिलन से जन्मा—मल्लिकार्जुन।
यहाँ की मिट्टी में कई कहानियाँ हैं। कहते हैं, यहाँ माता पार्वती का ‘सती’ रूप का एक अंश भी गिरा था, जो इसे शक्तिपीठों में से एक बनाता है। एक और कथा चंद्रवती नाम की राजकुमारी की है, जिसकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने इसी पर्वत पर अपना लिंग स्वरूप प्रकट किया था। यह दुनिया का इक मात्र ऐसा स्थान है जो एक साथ ज्योतिर्लिंग भी है और शक्तिपीठ भी—जहाँ शिव और शक्ति का पूर्ण एकाकार होता है।
ऐतिहासिक विरासत (Historical Legacy)
इतिहास के पन्नों को पलटें, तो श्रीशैलम ने शताब्दियों का उतार-चढ़ाव देखा है। सातवाहन राजाओं से लेकर इक्ष्वाकु वंश तक, यहाँ के पत्थरों ने हर कालखंड की गवाही दी है। 14वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के राजा हरिहर राय ने यहाँ ‘मुख मंडपम’ का निर्माण कराया। लेकिन सबसे खास नाम है—छत्रपति शिवाजी महाराज का। उन्होंने यहाँ एक भव्य गोपुरम बनवाया और उनकी अटूट भक्ति आज भी यहाँ की दीवारों में जीवित महसूस होती है।
द्रविड़ वास्तुकला (Dravidian Architecture)
आँखें बंद कीजिए और कल्पना कीजिए... ऊंचे-ऊंचे काले पत्थरों के परकोटे, जिन पर हाथियों, घुड़सवारों और पौराणिक दृश्यों की नक्काशी की गई है। द्रविड़ शैली में बना यह मंदिर वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर की बाहरी दीवारें ‘सप्त प्राकार’ के रूप में जानी जाती हैं। नल्लमला के घने जंगलों के बीच, कृष्णा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर प्रकृति और शिल्प का एक अलौकिक संगम है।
मल्लिकार्जुन का आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance)
मल्लिकार्जुन का महत्व केवल इसकी बनावट में नहीं, बल्कि इसकी दिव्यता में है। आदि शंकराचार्य ने यहाँ बैठकर ‘शिवानंद लहरी’ की रचना की थी। यह स्थल ‘कैलाश’ और ‘काशी’ के समान ही पवित्र माना जाता है। यहाँ आने वाले भक्त मानते हैं कि श्रीशैलम पर्वत के दर्शन मात्र से ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। यह स्थान साधना, तपस्या और ज्ञान का जीवित केंद्र है।
महाशिवरात्रि और उत्सव (Mahashivratri & Festivals)
महाशिवरात्रि के दौरान श्रीशैलम एक अलग ही रूप ले लेता है। ‘ब्रह्मोत्सवम’ की गूँज मीलों दूर तक सुनाई देती है। भक्त पाताल गंगा में स्नान कर, सीढ़ियाँ चढ़कर बाबा के दर्शन को आतुर रहते हैं। यहाँ का ‘पागल अलंकारम’ यानी शिखर पर मीलों लंबा कपड़ा लपेटने की रस्म देखने योग्य होती है। हर अनुष्ठान, हर आरती यहाँ के वातावरण को एक पवित्र ऊर्जा से भर देती है।
सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व (Cultural & Environmental Significance)
अक्का महादेवी जैसी महान कवयित्री से लेकर आधुनिक युग के लाखों श्रद्धालुओं तक, मल्लिकार्जुन ने सबको अपनी शरण में लिया है। आज, श्रीशैलम न केवल एक धार्मिक तीर्थ है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव टाइगर रिजर्व का भी क्षेत्र है। आज की भागती-दौड़ती जिंदगी में, यह मंदिर हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और मानसिक शांति का मार्ग दिखाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग केवल एक गंतव्य नहीं, एक अनुभव है—जो आपको खुद से मिलाता है।