सबरीमाला में 41 दिन क्यों ज़रूरी हैं? | मोक्ष की 18 सीढ़ियाँ | Sabarimala Temple Mystery in Hindi
क्या आपने कभी सोचा है कि क्या होता है जब इंसान अपना सब कुछ—नाम, पद और अहंकार—पीछे छोड़कर सिर्फ एक भक्त बन जाता है?
यह कहानी है उस दरबार की जहाँ अठारह स्वर्ण सीढ़ियाँ (Pathinettam Padi) केवल पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार हैं। यही है सबरीमाला मंदिर (Sabarimala Temple) का रहस्य, जहाँ हर साल करोड़ों भक्तों की धड़कन एक ही लय में बजती है।
सबरीमाला का आध्यात्मिक महत्व
समय के पहिये को पीछे घुमाएँ, तो पता चलता है कि सबरीमाला का अस्तित्व केवल ईंट और पत्थर से नहीं, बल्कि एक दिव्य संकल्प और भक्ति से बना है।
कहते हैं कि जब भगवान परशुराम ने केरल की पावन भूमि को समुद्र से निकाला, तो उन्होंने इसकी सुरक्षा के लिए पाँच 'शास्ता' मंदिरों की स्थापना की। इन पांचों में सबरीमाला सबसे शक्तिशाली और दुर्गम माना गया, जहाँ भगवान अयप्पा (Lord Ayyappa) 'धर्म शास्ता' और 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' के रूप में विराजमान हैं।
यहाँ योग और ध्यान की पराकाष्ठा पर पहुँचने वाले भगवान अयप्पा भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं, और संसार की सभी हलचलें यहाँ शांत हो जाती हैं।
भगवान अयप्पा की पौराणिक कथा
सबरीमाला की जड़ें उस पौराणिक कथा में छिपी हैं जो प्रेम, त्याग और अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
कथा है पंडलम के राजा राजशेखर की, जिन्हें पंपा नदी के तट पर एक दिव्य शिशु मिला। गले में बंधी मणि के कारण उनका नाम रखा गया—मणिकंदन।
मणिकंदन कोई साधारण बालक नहीं थे; वे शिव और विष्णु के मोहिनी रूप से उत्पन्न दिव्य शक्ति थे। जब उन्हें शेरनी का दूध लाने जंगल भेजा गया, तब उनकी असली शक्ति का पता चला। उन्होंने न केवल अधर्म का नाश किया, बल्कि यह वरदान माँगा कि वे सबरीमाला की चोटियों पर रहकर अपने भक्तों का मार्गदर्शन करेंगे।
आज भी पंडलम पैलेस से निकलने वाली 'थिरुवाभरणम' यात्रा उस प्राचीन संबंध की याद दिलाती है।
इतिहास और सांस्कृतिक महत्व
12वीं शताब्दी के आसपास पंडलम राजवंश के संरक्षण में यह मंदिर और भी सुदृढ़ हुआ।
सबरीमाला केवल हिंदुओं के लिए ही नहीं, बल्कि मानवता और भक्ति का केंद्र भी है।
मंदिर के पास स्थित वावर स्वामी की दरगाह इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। वावर, जो कभी लुटेरा था, भगवान अयप्पा की शक्ति से प्रभावित होकर परम भक्त बन गया।
आज भी सबरीमाला की यात्रा अधूरी मानी जाती है जब तक भक्त वावर के चरणों में शीश नवाकर श्रद्धा नहीं दिखाते।
41 दिन का कठोर व्रत: मंडला कालम
सबरीमाला की असली शक्ति इसकी सांस्कृतिक परंपराओं में बसती है।
यहाँ का 'मण्डला कालम' (41 दिन का उपवास) एक आध्यात्मिक क्रांति है।
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भक्त काले वस्त्र पहनते हैं → सांसारिक मोह-माया का त्याग।
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नंगे पैर चलते हैं → धरती की तपन और कांटों से धैर्य और अनुशासन सीखते हैं।
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भक्त अपने आप को और दूसरों को 'स्वामी' कहकर पुकारते हैं → तत्त्वमसि का अनुभव।
यह व्रत केवल शारीरिक कठिनाई नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुशासन और मोक्ष की यात्रा है।
अठारह स्वर्ण सीढ़ियाँ (Pathinettam Padi) और उनका प्रतीक
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पहली पाँच सीढ़ियाँ → हमारी पाँच इंद्रियाँ
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अगली आठ सीढ़ियाँ → राग-द्वेष और मानवीय विकार
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अंतिम पाँच सीढ़ियाँ → ज्ञान और विद्या का प्रतीक
41 दिन का व्रत और 'इरुमुडी' के साथ इस पर चढ़ना केवल उन भक्तों को ही अनुमति है जिन्होंने संपूर्ण अनुशासन पूरा किया हो।
त्योहार और अनुष्ठान
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मकर संक्रांति और Makara Vilakku: पहाड़ियों पर ज्योति और 'स्वामी शरणम' के जयकारों के साथ इतिहास का सबसे स्वर्णिम क्षण।
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पेटा थुल्लल नृत्य उत्सव: भक्त रंगों और भक्ति के उल्लास में झूमते हैं।
ये अनुष्ठान केवल परंपराएं नहीं हैं, बल्कि सिखाते हैं कि ईश्वर को पाने का मार्ग कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं।
यात्रा का अनुभव: आध्यात्मिक अहसास
सबरीमाला अब सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक अहसास है।
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थके हुए पैरों को शक्ति देता है
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अशांत मन को मौन की गहराई प्रदान करता है
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गर्भगृह में खड़े होकर भगवान अयप्पा की शांति देखते ही थकान मिट जाती है
सबरीमाला की यात्रा सिखाती है: असली मंदिर हमारे भीतर है।
अठारह सीढ़ियाँ और पंपा नदी जैसी पवित्रता हमें इस आंतरिक मंदिर तक पहुँचने में मार्गदर्शन करती हैं।