श्रीमद भगवद गीता सार - अध्याय 6 | आत्म संयम योग | आसान शब्दों में गीता ज्ञान | Bhagavad Gita

श्रीमद भगवत गीता के छठे अध्याय की विशेषताएँ

श्रीमद भगवत गीता के छठे अध्याय में 47 श्लोक हैं, जिनमें भगवान श्री कृष्ण ने आत्म संयम योग के महत्व को समझाया है। इस अध्याय में भगवान ने बंधन के कारण कर्मफल की आसक्ति को बताया है। भगवान श्री कृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि गुरु बनना या बनाना गीता का सिद्धांत नहीं है। वास्तव में, मनुष्य स्वयं अपना गुरु है। शरीर को "मैं", "मेरा" और "मेरे लिए" मानना शत्रुता है, जबकि अपने शरीर को आत्मा का वैभव समझकर जो मित्रता रखता है, उसका परम कल्याण होता है।
भगवान ने यह कहा कि फल की आशा से रहित होकर जो "कार्यम् कर्म" अर्थात करने योग्य प्रक्रिया का आचरण करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है। संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी मनुष्य संन्यासी अथवा योगी नहीं बन सकता। सर्व संकल्पों का अभाव ही सन्यास है। श्री कृष्ण ने यह स्वीकार किया है कि मन बहुत कठिनाई से वश में होने वाला है, लेकिन यह अभ्यास और वैराग्य द्वारा वश में किया जा सकता है। तपस्वियों और ज्ञानमार्गियों से भी श्रेष्ठ योगी वह है जो योग साधना में निरंतर अग्रसर रहता है।

इस अध्याय में योगेश्वर श्री कृष्ण ने प्रमुख रूप से योग की प्राप्ति के लिए अभ्यास पर बल दिया है। वे अर्जुन से कहते हैं, "हे अर्जुन, तू योगी बन।" समर्पण और आत्मनिष्ठा के साथ योगी का आचरण कर। श्री कृष्ण ने योगी की विशेषता यह बताई कि वह आत्मा के साथ पूर्णत: एक हो जाता है और संसार से ऊपर उठता है।

कर्म और योग का समन्वय

गीता के इस अध्याय में ध्यान योग का वर्णन महत्वपूर्ण है, जहां कर्म और योग का समन्वय प्रस्तुत किया गया है। कर्म संन्यास योग की परीक्षा आत्म संयम में सिद्ध होती है। पहले श्लोक में भगवान ने कहा है कि जो मनुष्य कर्मफल की आशा न रखकर, केवल अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही सच्चा योगी है। इस अध्याय में अष्टांग योग साधन के माध्यम से परमात्मा के साक्षात्कार की बात की गई है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि के द्वारा आत्मा के साथ परमात्मा का मिलन होता है।
श्री कृष्ण ने यह भी कहा कि जो थोड़ा भी योग साधन करता है, उसे उसका फल अवश्य प्राप्त होता है और वह व्यर्थ नहीं जाता। इस प्रकार, कर्मयोग का समन्वय और ध्यान योग के माध्यम से परमात्मा की प्राप्ति की दिशा स्पष्ट होती है।

अर्जुन के लिए श्री कृष्ण का उपदेश

इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को योगी बनने का उपदेश दिया है। इस उपदेश में ध्यान योग और कर्म योग की भूमिका को समझाते हुए उन्होंने बताया कि जो कर्मफल की आशा छोड़कर, केवल कर्म के प्रति समर्पित होकर योग साधना करता है, वही सच्चा योगी है। इस तरह श्रीमद भगवत गीता का छठा अध्याय 'आत्म संयम योग' एक सशक्त मार्गदर्शन है, जो जीवन को संतुलित और आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।
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