श्रीमद भगवद गीता सार- अध्याय 10 | भगवान ने बताया – मैं कौन हूँ और कहाँ हूँ? | Geeta Gyaan

भारत माता की गीता ज्ञान श्रंखला के पिछले भाग में हमने "राजविद्या राजगुह्यं" का संक्षिप्त परिचय प्राप्त किया। आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं गीता के दसवें अध्याय का सार - विभूति योग।

श्लोक:

"बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभ्यमेव च॥"

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि उनके दिव्य स्वरूप को न देवता जानते हैं और न ही महर्षि, क्योंकि वे स्वयं समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। वे अनुभव करने का विषय हैं, केवल श्रद्धा और भक्ति से ही उन्हें जाना जा सकता है। जो व्यक्ति उन्हें अजन्मा, अनादि और संपूर्ण लोकों का स्वामी मानता है, वही सच्चा ज्ञानी है।

अर्जुन का प्रश्न और श्रीकृष्ण का उत्तर

अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा, "हे जनार्दन! न देवता आपको जानते हैं और न ही दानव। केवल वही व्यक्ति आपको जान सकता है जिसे आप स्वयं अपनी कृपा से यह ज्ञान प्रदान करें। कृपया मुझे विस्तार से अपनी विभूतियों का वर्णन करें।"

इस पर श्रीकृष्ण उत्तर देते हुए कहते हैं - "जो भी इस संसार में प्रकाशवान, अद्भुत, विलक्षण और दिव्य प्रतीत होता है, चाहे वह कला, विद्या, संगीत, सद्कर्म, संकल्प, साहस या विज्ञान के रूप में हो, वह सब मेरी ही विभूति है। समस्त दिव्य शक्तियाँ मुझसे ही उत्पन्न होती हैं और इन्हीं के माध्यम से मैं मनुष्यों को धर्ममार्ग पर चलने की प्रेरणा देता हूँ।"

भगवान की विभूतियाँ

इस अध्याय में श्रीकृष्ण बताते हैं कि समस्त सृष्टि में जहाँ-जहाँ तेज, ऐश्वर्य और दिव्यता प्रकट होती है, वहाँ उनका ही अंश विद्यमान होता है। उन्होंने अर्जुन को यह भी समझाया कि उनकी विभूतियाँ अनंत हैं, किंतु वे संक्षेप में अपनी कुछ प्रमुख विभूतियों का उल्लेख कर रहे हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश का सार

अर्जुन ने जब श्रीकृष्ण से उनकी विभूतियों का विस्तार से वर्णन करने को कहा, तब श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया:

"अर्जुन! इस संपूर्ण जगत में जो भी तेजस्वी, शक्तिशाली और ऐश्वर्य से युक्त वस्तु है, वह मेरे तेज का अंश मात्र है। मेरी विभूतियों की कोई सीमा नहीं है। जो व्यक्ति मेरे इस ज्ञान को श्रद्धा से समझता है, वह अनन्य भाव से मेरा ध्यान करता है। ऐसे भक्तों को मैं योग प्रदान करता हूँ और उनके हृदय में ज्ञान रूपी दीपक से अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करता हूँ।"

श्रीमद भगवद गीता के दसवें अध्याय "विभूति योग" में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अनंत शक्तियों और विभूतियों का वर्णन करके अपने सर्वव्यापक स्वरूप की पुष्टि की है। यह अध्याय हमें यह सिखाता है कि भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं और उनकी विभूतियों को पहचानकर हम उन्हें अपनी भक्ति और श्रद्धा से अनुभव कर सकते हैं।

"जो इस ज्ञान को समझकर मुझे भजता है, मैं स्वयं उसके हृदय में वास करता हूँ।"

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