गीता – विश्व का ग्रंथ || Swami Satyamitranand Ji Maharaj | Bhagwad Geeta | Pravachan | Bharat Mata
गीता का अध्ययन और परमात्मा की यात्रा
भारत माता की इस प्रस्तुति में स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी महाराज बताते हैं कि गीता के अध्ययन के दौरान हमें कभी-कभी अपने सांसारिक चिंताओं और मोह-माया को कुछ समय के लिए भुलाकर परमात्मा की यात्रा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। वे कहते हैं कि गीता केवल बुद्धि से समझी नहीं जा सकती, इसके लिए भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव की आवश्यकता होती है। गीता का वास्तविक ज्ञान तब मिलता है जब हम उसमें पूरी तरह से समर्पित हो जाते हैं।
गीता में समर्पण और साधना का महत्व
स्वामी जी बताते हैं कि साधना, तप, और भगवान के प्रति समर्पण के बिना गीता का गहरा अर्थ समझ पाना मुश्किल है। वे उदाहरण के रूप में सुदामा की कथा का उल्लेख करते हैं। सुदामा, जो एक अत्यंत गरीब व्यक्ति थे, फिर भी अपनी साधना और भगवान श्री कृष्ण के प्रति अपने विश्वास में डटे रहे। उनके पास कुछ भी देने के लिए नहीं था, लेकिन उन्होंने जो भी किया, वह भगवान के चरणों में समर्पित किया। यह दिखाता है कि समर्पण और प्रामाणिकता के बिना कोई भी साधना अधूरी रहती है।
गीता - एक जीवन दर्शन
स्वामी जी इस बात पर जोर देते हैं कि गीता केवल एक शास्त्र नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है, जो हमें शांति, प्रेम और समर्पण की भावना सिखाती है। श्री कृष्ण कहते हैं, "जो मुझे अपना मित्र मानते हैं, उन्हें शांति प्राप्त होती है।"
" इसका मतलब है कि अगर हम परमात्मा को अपना सखा, मित्र मान लें, तो वह हमें अपनी दिव्य शांति और मार्गदर्शन प्रदान करेंगे।
गीता का सार्वभौमिक संदेश
स्वामी जी के अनुसार, गीता की सबसे बड़ी बात यह है कि यह केवल हिंदू धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर व्यक्ति के लिए एक सार्वभौमिक ग्रंथ है। गीता का संदेश हर प्राणी को मिल सकता है, बशर्ते वह अपने दिल में परमात्मा के साथ सच्चे संबंध बनाने का प्रयास करे।
गीता का वास्तविक उद्देश्य
अंत में, स्वामी जी का यह संदेश है कि जब हम अपने अहंकार और ममता को छोड़कर पूरी श्रद्धा और भक्ति से परमात्मा की ओर बढ़ते हैं, तो हमारी जिंदगी में शांति और संतोष की कोई कमी नहीं रहती। यही गीता का वास्तविक उद्देश्य है – मन, वचन और क्रिया से भगवान के साथ अडिग संबंध बनाना।