जीवन के सत्य का स्मरण कीजिए | Swami Satyamitranad Ji Maharaj | Bhagwad Geeta | Pravachan
स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी महाराज के उपदेश
भारत माता की इस प्रस्तुति मे स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी महाराज कहते हैं कि वस्तु बुरी नहीं होती, परंतु जब हम उस वस्तु के साथ एकाकार हो जाते हैं और जब वह वस्तु हमें यह एहसास दिलाने लगे कि अब मैंने इस पर शासन कर लिया है, तब वास्तविकता बदल जाती है। हम मनुष्य, जो चेतन हैं, इस स्थिति में दु:ख का अनुभव करने लगते हैं, जबकि जड़ प्रकृति हंसती है। स्वामी जी का आशीर्वाद यह है कि हम चेतन रूप में जागृत रहें और जड़ के प्रभाव से मुक्त रहें। यह ही है "संस्पर्श" का अर्थ - दुख के रूप में आना और फिर उसकी नासमझी से मुक्ति पाना।
भजन और भक्ति का महत्व
भगवान का यह मार्गदर्शन है कि हमें बुढ़ापे में भजन की प्रक्रिया को स्थगित नहीं करना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में कहा है: "तन थाके कर कंपन ला शो शोभा गई मुखन" - अर्थात, शरीर का कष्ट और हाथों का कंपकंपी जीवन का हिस्सा है, परंतु ममता और मोह को छोड़ने की आवश्यकता है।
संसार की अस्थिरता और मोह से मुक्ति
भारतवर्ष में यह प्रचलित है कि एक व्यक्ति जिस घर में वर्षों से रह रहा होता है, अगर वह घर किसी और के नाम पर हो, तो उसके जीवन के अंत में उसे घर के लोग भी पहचानने से कतराते हैं। जैसे सूरदास जी महाराज कहते हैं: "जाति रिया ते प्रीति घनेरी सोई देख डर है" - हमारे जीवन में हमें यह समझने की आवश्यकता है कि न तो घर, न संपत्ति, और न ही रिश्ते हमारे हैं। सब कुछ अस्थायी है।
काम, क्रोध और लोभ पर नियंत्रण
स्वामी जी ने कहा कि जीवन का सत्य यह है कि बुढ़ापे और मृत्यु से पहले हमें अपनी काम, क्रोध और लोभ की लहरों से मुक्त होने की आदत डालनी चाहिए। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा कि जो व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध, लोभ, और काम की तरंगों को नियंत्रित कर पाता है, वही असली योगी है। ऐसे व्यक्ति को वास्तविक सुख और शांति मिलती है।
नर और नरोत्तम का अंतर
इसके अलावा, भगवान ने अर्जुन से कहा, "नर और नरोत्तम का अंतर समझो।" जब तक कोई अपना स्वार्थ और काम की लहरों से मुक्त नहीं होता, तब तक वह वास्तविक पुरुषार्थ नहीं कर सकता। भगवान के दृष्टिकोण से ही जीवन की सार्थकता को समझा जा सकता है।
गीता में इस पर भी चर्चा की जाती है कि यज्ञ और तपस्या के फल केवल भगवान को ही प्राप्त होने चाहिए। जो व्यक्ति भगवान के प्रति समर्पित होकर अपने कर्तव्यों को निभाता है, उसे वही फल मिलता है। स्वामी जी कहते हैं कि भक्ति और तपस्या की सफलता तभी प्राप्त होती है, जब हम भगवान से यह समझ लें कि "सर्व लोक महेश्वरम्" - सारे संसार के मालिक, केवल वही हमारे तप और यज्ञ के असली भोक्ता हैं।
भगवान की कृपा से मुक्ति का मार्ग
साधक के लिए यज्ञ का फल वही होता है, जो भगवान अपने भक्तों को अनुग्रह के रूप में देते हैं। इसी तरह, भगवान के दर्शन, उनका प्रेम, और उनके द्वारा दिया गया आशीर्वाद ही असली फल है।
ध्यान रखें, जितनी भी कठिनाइयां आ रही हैं, चाहे वह काम, क्रोध, लोभ या मोह हो, उन सभी से पार पाने के लिए हमें भगवान का स्मरण और उनका ध्यान हमेशा करना चाहिए। तभी हम सही अर्थ में जीवन को जी सकते हैं।