Chaava | छत्रपति संभाजी महाराज: जिसने औरंगज़ेब को हिला दिया | मराठा शौर्य की गाथा | कहानी छावा की

संभाजी महाराज: मराठा साम्राज्य के अजेय योद्धा

आज सुनिए एक ऐसे राजा की कहानी जिन्होंने औरंगज़ेब को न केवल हराया, बल्कि उसे यह भी दिखा दिया कि मराठों की धरती पर कोई भी घुसपैठिया नहीं टिक सकता। वो राजा जिन्होंने मुगलों के हर छल को नकारते हुए अपने धर्म और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।

संभाजी महाराज का जन्म और प्रारंभिक जीवन

संभाजी महाराज का जन्म वर्ष 1657 को पुरंदर किले में हुआ था, जो महाराष्ट्र के पुणे जिले के पश्चिमी घाट में स्थित है। जिनके पिता, महान छत्रपति शिवाजी महाराज और माता सइबाई थी। ये राजा जब दो साल के थे, तो उनकी माता का निधन हो गया और फिर उनका पालन-पोषण दादी जीजाबाई ने किया। जीजाबाई ने इस राजा को हमेशा एक वीर और साहसी व्यक्ति बनने के लिए प्रेरित किया।
ये कहानी है संभाजी राजे की। 
इनके जीवन की पहली ऐतिहासिक घटना 11 जून 1665 को घटित हुई, जब उनके पिता शिवाजी महाराज मुगलों के साथ पुरंदर की संधि कर रहे थे। इस संधि के माध्यम से 23 किलों को मुगलों को सौंपा गया और शिवाजी महाराज को इस शर्त के तहत मुगलों के दरबार में जाने के लिए भी बाध्य किया गया। यह संधि न केवल एक कूटनीतिक कदम थी, बल्कि संभाजी की शिक्षा और सैन्य रणनीतियों के विकास में भी सहायक साबित हुई।

शिक्षा और युद्ध कौशल

संभाजी को बचपन से ही विभिन्न शस्त्रों और युद्ध कौशल में गहरी रुचि थी। मात्र 9 वर्ष की आयु में उन्होंने 1200 किलोमीटर की यात्रा की थी और इस यात्रा ने उन्हे जीवन के कई अहम पहलुओं को समझने का अवसर दिया। उन्हे 13 वर्ष की आयु में 13 भाषाओं का ज्ञान प्राप्त हुआ था और वो इन भाषाओं में निपुण हो गए थे। संभाजी की भाषा शैली और संवाद कला इतनी प्रभावी थी कि वो किसी भी शासक को आसानी से प्रभावित कर सकते थे।

मराठा साम्राज्य के संरक्षक

उन्होंने अपने शासनकाल के दौरान 120 से ज्यादा युद्ध लड़े और विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया। संभाजी के बारे में कहा जाता है कि वह शुरू से ही विद्रोही स्वभाव के थे। उनको काबू में लाने के लिए खुद शिवाजी ने 1678 में पन्हाला किले में संभाजी को बंदी बना लिया था। हालांकि, वह अपनी पत्नी के साथ भाग निकले और मुगलों से जा मिले और एक साल तक उनके साथ रहे। फिर एक दिन पता चला कि मुगल सरदार दिलेर खान उनको गिरफ्तार कर दिल्ली भेजना चाहता है तो वह महाराष्ट्र लौट आए। वहां उनको दोबारा बंदी बना कर पन्हाला भेज दिया गया था। 
अप्रैल 1680 में शिवाजी महाराज की मृत्यू के वक्त संभाजी कैद में ही थे। शिवाजी के दूसरे बेटे राजाराम को सिंहासन पर बैठाया गया था। इसकी सूचना मिलने पर संभाजी ने अपने शुभचिंतकों के साथ मिल कर पन्हाला के किलेदार को मारकर किले पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 20 जुलाई 1680 को संभाजी राजे का राज्याभिषेक हुआ था। 

संभाजी महाराज की मुगलों पर विजय

उनका उद्देश्य केवल मराठा साम्राज्य की रक्षा करना नहीँ था, बल्कि पूरे भारत में मुगलों के आतंक को समाप्त करना था। उनकी सेनाओं ने गोवा में पुर्तगालियों के खिलाफ आक्रमण किया और मैसूर पर भी कई सफल हमले किए। संभाजी ने अंग्रेजों से भी संधि की और उनके साथ अपने सामरिक हितों की रक्षा की।
अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए ही संभाजी राजे ने मुगलों का सामना करना शुरू कर दिया था और बुरहानपुर शहर पर हमला कर उसे तहस-नहस कर दिया था। इस शहर की सुरक्षा में तैनात मुगलों की सेना को बर्बाद कर दिया था। इससे औरंगजेब उनसे चिढ़ गया था। 
साल 1687 में मुगलों से मराठा सेना की भीषण लड़ाई हुई, जिसमें मराठे जीत तो गए पर सेना काफी कमजोर हो गई थी। संभाजी के विश्वासपात्र सेनापति हंबीरराव मोहिते इस लड़ाई में शहीद हो गए थे।

संभाजी महाराज की शहादत

1689 में मुगलों ने संभाजी महाराज को धोखे से बंदी बना लिया और उन्हें औरंगजेब के समक्ष पेश किया गया। । मुगल सरदार मुकर्रब खान ने संभाजी के सभी सरदारों को मार डाला संभाजी को उनके सलाहकार कवि कलश के साथ बहादुरगढ़ ले जाया गया था। 
संभाजी को देखकर औरंगजेब को यकीन ही नहीं हुआ, और वो जमीन पर बैठकर अपने अल्लाह को याद करने लगा। जैसे ही वो बैठा कवि कलश ने कहा-

“जो रवि छवि लछत ही खद्योत होत बदरंग,
त्यो तूव तेज निहारी ते तखत तज्यो अवरंग।। ”

जिसका अर्थ है जिस तरह सूरज के प्रकाश को देखकर जुगनू का प्रकाश नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार यह राजा अपना सिंहासन छोड़ कर तुम्हारे समक्ष आया है। अब वह आग बबूला होगया उसने आदेश दिया की कवि कलश की जुबान काट दो। उनसे संभाजी के सामने प्रस्ताव रखा कि वह सारे किले मुगल शासक को सौंप कर इस्लाम धर्म कबूल कर लें। इससे उनकी जान बख्श दी जाएगी। संभाजी राजे ने इसे मानने से साफ मना कर दिया तो उन पर अत्याचार शुरू कर दिया गया। 
संभाजी राजे और कवि कलश को जोकर जैसे कपड़े पहना कर शहर में घुमाया।  उन पर पत्थर बरसाए गए। भाले चुभाए और एक बार फिर से इस्लाम कबूलने के लिए कहा। मना करने पर उनकी आंखें और नाखून निकाल लिए गए थे। आखिरकार 11 मार्च 1689 को शरीर के कई टुकड़े कर संभाजी की जान औरंगजेब ने ले ली थी। 

संभाजी महाराज का अमर बलिदान

महाराष्ट्र में कहावत मशहूर है कि औरंगजेब ने संभाजी राजे की हत्या से ठीक पहले कहा था कि मेरे चार बेटों में से अगर एक भी तुम्हारे जैसा होता, तो पूरा हिन्दुस्तान कब का मुगल सल्तनत में समा चुका होता। बताया जाता है कि संभाजी के शव के टुकड़े तुलापुर की नदी में फेंक दिए गए थे, जहां से निकालकर कुछ लोगों ने शरीर की सिलाई की और अंतिम संस्कार किया था। 
संभाजी के संघर्ष ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चे वीर कभी नहीं हारते, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हो। उनकी शहादत ने यह दिखा दिया कि यदि हम अपने धर्म और मातृभूमि के लिए दृढ़ नायक बने रहें, तो कोई भी शक्ति हमें झुका नहीं सकती। संभाजी की मृत्यु के बाद, मराठों ने एकजुट होकर मुगलों को हराया और औरंगज़ेब की सत्ता समाप्त कर दी।

संभाजी महाराज का जीवन हमें यह सिखाता है कि धर्म, मातृभूमि और मूल्यों की रक्षा से बड़ा कोई बलिदान नहीं

 "जय हिंद! जय मराठा! जय संभाजी महाराज!" 

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