आध्यात्मिक कवियित्री और कृष्ण भक्त मीरा बाई का इतिहास | Meera Bai Ki Kahani | Bharat Samanvay

भगवान श्री विष्णु के अवतार, श्री कृष्ण जिन्होंने भगवत गीता के माध्यम से पूरे  विश्व को कर्मयोग्य की शिक्षा प्रदान की। मीराबाई जिन्हें भगवान श्री कृष्ण की परम भक्त के रूप में जाना जाता है। मीराबाई न सिर्फ एक प्रसिद्ध संत थी बल्कि कृष्ण भक्ति शाखा की मुख्य कवयित्री भी थीं। कृष्ण के प्रति मीरा की अनन्य भक्ति बाल्यावस्था से ही प्रारम्भ हो गयी थी, जब से मीरा ने कृष्ण को अपना पति मान लिया ,और अपना सर्वस्व कृष्ण को समर्पित कर दिया। मीरा ने  राजस्थानी, ब्रज और गुजराती भाषाओं में श्री कृष्ण के लिए कई गीत भी लिखे। मीरा का समर्पण अपने कृष्ण के प्रति इतना गहरा था कि संसार की समस्त शक्तियां भी उसे विचलित नहीं कर पायी। मीरा की कृष्ण के प्रति भक्ति एक मिसाल है जो स्त्री प्रधान भक्ति भावना का सुसंस्कृत  रूप  है। इस संसार के सभी वैभव छोड़कर मीरा ने श्री कृष्ण को ही अपना सब कुछ माना और राजसी ठाठ बाठ छोड़कर मीरा ने कृष्ण की भक्ति की और अपना पूरा जीवन वैराग्य में व्यतीत किया। भक्ति की ऐसी दृढ आस्था बहुत कम ही देखने को मिलती है।  

हिन्दू धर्म की एक पौराणिक कथा के अनुसार मीरा बाई का जन्म 16 वीं शताब्दी में जोधपुर के राठौड़ रतन सिंह की इकलौती पुत्री के रूप में हुआ। बचपन से ही वह कृष्ण भक्ति में रम गयी थी। मीरा बाई का कृष्ण प्रेम अपनी चरम सीमा तक तब पंहुचा, जब उनके पड़ोस के घर बारात आयी। सभी औरतें छत पर खड़े हो कर बारात देख रही थी। मीरा भी अपनी माँ के साथ बारात देखने लगी। बारात को देख कर मीरा ने अपनी माँ से पूछा, माँ मेरा दूल्हा कौन है। इस पर उनकी माँ ने उन्हें कृष्ण की मूर्ति दिखा कर कहा यही तुम्हारा दूल्हा है। बस यही बात मीरा के बाल मन में एक गांठ की तरह बंध गयी। 

जब मीरा विवाह योग्य हो गयी, तो उनका विवाह महाराणा सांगा के पुत्र, राजा भोजराज संग बड़ी धूम धाम से करवाया गया, परन्तु मीरा इस विवाह से खुश न थी। विदाई के समय मीरा अपने साथ कृष्ण भगवान की मूर्ति अपने ससुराल ले कर आयी। बाल्यकाल से ही मीरा कृष्ण की भक्ति में डूब चुकी थी, विवाह के पश्चात भी अक्सर मीरा अपने घरेलू काम काज करने के बाद मंदिर जाती और कृष्ण की मूर्ति के आगे नाचती व भजन भाव में अपना ध्यान लगाती थी। 

परन्तु पुरुष प्रधान समाज में मीरा की भक्ति उनके परिवार वालों को रास नहीं आयी। मीरा की नन्द ऊदाबाई ने तो उन्हें बदनाम करने के लिए मीरा के पति से यह तक कह दिया की मीरा का कहीं प्रेम सम्बन्ध है, और उसने मीरा को मंदिर में उनके प्रेमी से बात करते हुए भी देखा है। यह बात सुन कर राणा भोजराज बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने मीरा से चिल्लाते हुए कहा '' कौन है तुम्हारा प्रेमी, किससे बाते कर रही थी? कहा है वो उसे अभी मेरे सामने लाओ? तब मीरा ने सामने रखी अपने गोविन्द की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए जवाब दिया, मेरा प्रेमी तो सामने ही है, जिन्होंने मेरा दिल चुराया है। मीरा का यह बर्ताव देख कर राणा भोजराज को बहुत दुःख हुआ और वह चुप चाप कक्ष से बाहर चले गए। 

मीरा के विवाह के 10 वर्ष बाद एक युद्ध में उनके पति भोजराज की मृत्यु हो गयी। छः महीने बाद मीरा के पिता और उनके ससुर का भी देहांत हो गया था। अपने प्रियजनों की मृत्यु ने मीरा को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था। इसके बाद मीरा बाई का मन सांसारिक मोह माया से दूर हो गया।

कुछ समय बाद मीरा बाई संत रविदास से मिली जो आजीविका के लिए जूते गांठने का कार्य करते थे। मीरा ने उनसे सूर्त शब्द योग की दीक्षा प्राप्त की। परम्परा के विरुद्ध, उनकी प्रभु भक्ति रूढ़ियों के विपरीत थी, साधु संतो के साथ निरंतर उठना बैठना उनके परिवार और समाज के सामने उन्हें निंदा का पात्र बनाने का कार्य करने लगा था। राजवंश की परम्परा के अनुसार राजघराने की महिलाये किसी भी बाहरी व्यक्ति से नहीं मिलती थी। राज घराने की प्रतिष्ठा व मर्यादा के अनुसार यह एक प्रकार से मर्यादाओ का उलंघन था। इस कारण यह बात राज्य में किसी को पसंद न आयी कि राज परिवार की एक बहू साधारण लोगो से मिले व ऐसे व्यक्ति को अपना गुरु माने जो आजीविका के लिए जूते गांठने का कार्य करता हो। 

 

मीरा बाई के देवर राणा रतन सिंह, मीरा का बाहरी व्यक्तियों से  मिलना पसंद नहीं करते थे, इसलिए राणा रतन सिंह ने अपनी बहन ऊदाबाई के हाथों, फूलों की टोकरी में एक ज़हरीला सांप रख कर मीरा को देने का आदेश दिया। ऊदाबाई मीरा के पास गयी व टोकरी मीरा को दे कर बोली, महाराज ने भेंट में तुम्हारे लिए हीरो का हार भेजा हैं। जब मीरा ने वह टोकरी अपने हाथों में ली और उसे खोल कर देखा तो उस टोकरी में हीरों का एक सुन्दर हार था। जिसे देख कर ऊदाबाई आश्चर्यचकित रह गयी और उन्हें मीरा के खिलाफ किये गए अपने कार्यों पर अफ़सोस हुआ। ऊदाबाई मीरा के चरणों में गिर गयी और उनसे माफ़ी माँगने लगी। मीरा बाई ने बड़े स्नेह से उन्हें उठाया और सांत्वना देकर उन्हें क्षमा कर दिया। 

जिसके बाद राणा रतन सिंह निरंतर मीरा की हत्या का प्रयास करते रहे और असफल होते गए। एक दिन एक सैनिक ने राजा से कहा आप मीरा को श्री कृष्णा के प्रसाद के रूप में विषयुक्त पंचामृत पीने के लिए दीजिये। वह पंचामृत के लिए कभी मना नहीं करेगी और पंचामृत पीते ही  उसकी मृत्यु हो जाएगी। जैसे ही ऊदाबाई को इस षड्यंत्र का पता चला उन्होंने मीरा को तुरंत बताया, परन्तु  मीरा बोली मैं उस विष का सेवन अवश्य करुँगी, मेरे गिरधर का जो आदेश है मुझे वह स्वीकार है। जिसके बाद भरी सभा में मीरा ने उस विष का पान किया परन्तु मीरा को कुछ भी न हुआ।

जिसके पश्चात भी कई बार राणा रतन द्वारा उन्हें मारने की कोशिश की गयी, लेकिन श्री कृष्ण ने उन्हें हर संकट से बाहर निकाला। आखिर कार मीरा बाई ने घर छोड़ दिया और वृन्दावन व द्वारका में कृष्ण भक्ति में मगन होकर अपना जीवन व्यतीत करने लगी।  

कहा जाता हैं कि जीवन भर भक्ति करने के कारण उनकी मृत्यु भी श्रीकृष्ण की भक्ति करते हुए ही हुई थीं। मान्यताओं के अनुसार द्वारका में वो कृष्ण भक्ति करते-करते श्रीकृष्ण की मूर्ति में समां गईं थी।  

 

Bharat Mata परिवार की ओर से मीरा के अनंत प्रेम और कृष्ण भक्ति को शत शत नमन।   

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