जीवन का वास्तविक फल क्या है? | Swami Satyamitranand Ji Pravachan | Jeevan ka vastavik Phal Kya Hai?
भारत माता की प्रस्तुति में स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज कहते हैं कि — जो व्यक्ति अपने इष्ट देव से प्रेम करता है, उनका स्मरण करता है, वही सच्चे अर्थों में जीवन को पवित्र बनाता है।
कृष्ण रता, कृष्ण अनुस्मरती का भाव यही है कि दिन-रात भगवान का नाम स्मरण किया जाए। इसके लिए न धन चाहिए, न कोई विशेष साधन — केवल नियम और निष्ठा चाहिए।
भगवान का स्मरण और मानसिक शांति
सोने से पहले अगर कोई व्यक्ति श्रद्धा से “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव” का जप कर ले, तो उसके मन के बुरे विचार भी शांत होने लगते हैं और अंतःकरण निर्मल होने लगता है।
जो व्यक्ति सुबह उठकर, दिनभर और रात में भी भगवान का स्मरण करता रहता है, उसका जीवन तेजस्वी, प्रकाशित और अर्थपूर्ण हो जाता है। उसका अहंकार धीरे-धीरे सेवा-भाव में परिवर्तित हो जाता है और वह हर प्राणी में परमात्मा का दर्शन करने लगता है। यही सच्ची आध्यात्मिक उन्नति है।
महाराज एकनाथ जी की कथा और करुणा
महाराज एकनाथ जी की कथा के माध्यम से समझाते हैं कि जब साधक हर जीव में ईश्वर को देखता है, तो उसके व्यवहार में करुणा और प्रेम स्वतः आ जाता है। विरोध, द्वेष और कटुता का समाधान भी केवल भक्ति और ईश्वर-स्मरण से ही संभव है।
मतभेद और सनातन परंपरा – मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए — यही भारत की सनातन परंपरा रही है।
सच्चे भक्त की पहचान
एक सच्चे भक्त की पहचान उसका नियम, संयम और विश्वास होता है। जैसे एक संत ने अस्वस्थ होने पर भी अपने जप का नियम नहीं छोड़ा और स्वयं भगवान ने उसके जप को पूर्ण किया। यह दर्शाता है कि जब मनुष्य अपनी सामर्थ्य की अंतिम सीमा तक प्रयास करता है, तब परमात्मा स्वयं उसका सहारा बनते हैं।
जीवन का सार्थक उद्देश्य
महाराज अंत में समझाते हैं कि संसार नश्वर है, अहंकार व्यर्थ है और मनुष्य को सदा विनम्र रहकर ईश्वर की शरण में रहना चाहिए। जीवन का सच्चा फल यही है कि प्रभु का स्मरण हो, सेवा हो, सत्कर्म हो और हर क्षण सार्थक बने।
नेत्रों से प्रभु का दर्शन, कानों से कथा, हाथों से सेवा और हृदय में ईश्वर का वास — यही मानव जीवन की सार्थकता है। जो यह समझ लेता है, वही वास्तव में जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करता है।