गीता के माध्यम से जानिए: युद्ध के मैदान से ज्ञान की प्राप्ति | Swami Satyamitranand Giri Ji Maharaj
भारत माता की इस प्रस्तुति में स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज कहते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता केवल पढ़ने का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को गाने का अमर गीत है। अपने इस अत्यंत भावपूर्ण और विचारोत्तेजक प्रवचन में स्वामी जी “गीता सुगीता कर्तव्या” के सूत्र को केंद्र में रखकर यह स्पष्ट करते हैं कि गीता का वास्तविक स्वरूप स्वाध्याय तक सीमित नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारकर, उसे संगीत की तरह जीने में है।
स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज बताते हैं कि प्रत्येक संप्रदाय के अपने-अपने ग्रंथ हैं और उनका अध्ययन अत्यंत पुण्यदायी है। वल्लभ संप्रदाय के लिए उनके ग्रंथ, स्वामीनारायण संप्रदाय के लिए शिक्षा पत्री, रामानंदी संप्रदाय के लिए रामायण—इन सभी का अध्ययन करना चाहिए। किंतु श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान इसलिए अद्वितीय है क्योंकि यह किसी ऋषि या महात्मा द्वारा रचित नहीं, बल्कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुखकमल से प्रकट हुई दिव्य वाणी है। स्वामी जी विनोदपूर्ण शैली में कहते हैं कि संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे गाना या रोना न आता हो। कोई मंच पर गाता है, कोई स्नानघर में—लेकिन बिना गाए कोई नहीं रह सकता। ठीक उसी प्रकार, जब गीता को केवल अध्ययन का विषय न बनाकर जीवन का संगीत बना लिया जाता है, तब वह स्वयं माँ की तरह करुणा से भरकर अपने सारे संदेश साधक के भीतर प्रकट कर देती है।
स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज बताते हैं कि प्रत्येक संप्रदाय के अपने-अपने ग्रंथ हैं और उनका अध्ययन अत्यंत पुण्यदायी है। वल्लभ संप्रदाय के लिए उनके ग्रंथ, स्वामीनारायण संप्रदाय के लिए शिक्षा पत्री, रामानंदी संप्रदाय के लिए रामायण—इन सभी का अध्ययन करना चाहिए। किंतु श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान इसलिए अद्वितीय है क्योंकि यह किसी ऋषि या महात्मा द्वारा रचित नहीं, बल्कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुखकमल से प्रकट हुई दिव्य वाणी है। स्वामी जी विनोदपूर्ण शैली में कहते हैं कि संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे गाना या रोना न आता हो। कोई मंच पर गाता है, कोई स्नानघर में—लेकिन बिना गाए कोई नहीं रह सकता। ठीक उसी प्रकार, जब गीता को केवल अध्ययन का विषय न बनाकर जीवन का संगीत बना लिया जाता है, तब वह स्वयं माँ की तरह करुणा से भरकर अपने सारे संदेश साधक के भीतर प्रकट कर देती है।
इस प्रवचन में धृतराष्ट्र, संजय और अर्जुन—इन तीनों को गीता के प्रथम श्रोता के रूप में नमन किया गया है। धृतराष्ट्र शारीरिक रूप से अंधे थे, किंतु उनके भीतर जानने की जिज्ञासा जागी। यही संदेश दिया गया कि चाहे मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, मोह या सत्ता के मद में अंधा क्यों न हो, यदि सत्य जानने की आकांक्षा उत्पन्न हो जाए, तो भीतर का अंधकार अवश्य नष्ट हो सकता है। संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई और अर्जुन स्वयं भगवान के समीप बैठकर गीता के अमृत का पान कर रहे थे। कुरुक्षेत्र को स्वामी जी भारत की महानता का प्रतीक बताते हैं—क्योंकि संसार में यही एक ऐसा युद्धभूमि है जहाँ प्रतिशोध नहीं, बल्कि ज्ञान का प्राकट्य हुआ। अर्जुन का विषाद हम सभी का विषाद है और श्रीकृष्ण का उपदेश समस्त मानवता के लिए पथप्रदर्शक है। भगवान का सारथी बनकर अपने ऐश्वर्य को भूल जाना और शरणागत की रक्षा करना—यही गीता का जीवंत संदेश है। अंत में अर्जुन का शरणागति भाव—“शिष्यस्तेऽहं शाधि मां प्रपन्नम्”—हमें सिखाता है कि जो प्रपन्न होता है वही वास्तव में भगवान के सिंहासन तक पहुँचता है, जैसे सुदामा। यह प्रवचन केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन को आलोकित करने वाली आध्यात्मिक यात्रा है।