गीता के माध्यम से जानिए - ज्ञान का नाश सर्वनाश है | Swami Stayamitranand ji Maharaj || Geeta Gyaan
यह प्रवचन वीडियो पूज्य स्वामी सत्यमित्रानंद जी महाराज द्वारा दिए गए उस गहन आध्यात्मिक संदेश को प्रस्तुत करता है, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता के जीवन-दर्शन को अत्यंत सरल और व्यावहारिक रूप में समझाया गया है। Bharat Mata YouTube Channel पर प्रत्येक रविवार प्रकाशित होने वाले इन गीता प्रवचनों में स्वामी जी आधुनिक मानव की मानसिक दुविधाओं का समाधान गीता के शाश्वत ज्ञान से करते हैं।
इस भगवद्गीता प्रवचन हिंदी में स्वामी सत्यमित्रानंद जी महाराज अर्जुन की उस स्थिति को स्पष्ट करते हैं, जहाँ एक महान योद्धा भी कर्तव्य और करुणा के बीच भ्रमित हो जाता है। जब अर्जुन युद्धभूमि में खड़े होकर यह निर्णय नहीं कर पाते कि उनके लिए प्रेय क्या है और श्रेय क्या है, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का सनातन मार्ग दिखाते हैं।
पूज्य स्वामी जी समझाते हैं कि गीता का यह संवाद आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक मनुष्य भी निर्णय, भय और मानसिक संघर्ष से गुजरता है। इस प्रवचन में बताया गया है कि यदि गीता का एक श्लोक भी सही भाव से समझ लिया जाए, तो वह भीतर की बुद्धि को जागृत कर देता है।
स्वामी सत्यमित्रानंद जी महाराज द्वारा इस प्रवचन में प्रेय और श्रेय के अंतर को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से समझाया गया है।
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प्रेय — जो तत्काल सुख देता है: धन, पद, प्रतिष्ठा
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श्रेय — जो आत्मकल्याण की ओर ले जाता है: ज्ञान, भक्ति, सेवा और वैराग्य
यही भारतीय चेतना और सनातन दर्शन की विशेषता है कि अर्जुन युद्ध करते हुए भी भगवान श्रीकृष्ण से श्रेय का मार्ग पूछते हैं। इस गीता प्रवचन by Swami Satyamitranand Ji Maharaj में यह भी बताया गया है कि संसार की उपलब्धियाँ प्रारब्ध से मिलती हैं, लेकिन श्रेय साधना और आत्मज्ञान से प्राप्त होता है।
स्वामी जी इस वीडियो में भगवान श्रीकृष्ण के पहले उपदेश
“अशोच्यानन्वशोचस्त्वं”
को अत्यंत सहज और करुण भाषा में समझाते हैं। वे बताते हैं कि भगवान कठोर सत्य को भी इतनी कोमलता से कहते हैं कि शिष्य का हृदय टूटता नहीं, बल्कि जागृत हो जाता है।
इस प्रवचन में कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्ति योग का संतुलन रामकृष्ण परमहंस के दृष्टांत के माध्यम से स्पष्ट किया गया है। स्वामी जी बताते हैं कि संसार में रहते हुए कर्म करो, लेकिन आसक्ति के बिना—पहले ईश्वर-स्मरण, फिर कर्म—यही गीता का सार है।