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गीता के माध्यम से जानिए मोह और कर्तव्य में अंतर || Swami Styamitranand ji Maharaj Pravachan

भारतीय दर्शन, गीता ज्ञान और आध्यात्मिक जीवन के उच्चतम स्तर को समझाते हुए स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी ने बताया कि जब मनुष्य ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त कर लेता है, तब संसार का मोह उसे विचलित नहीं करता। मोह और कर्तव्य में बड़ा अंतर है। कर्तव्य निभाने से विवेक जागृत रहता है, जबकि मोह में किया गया कर्म विवेक को सुला देता है और व्यक्ति अपने तथा समाज—दोनों के लिए हानिकारक आचरण कर बैठता है।

अर्जुन का श्रेष्ठत्व और ज्ञान का विसर्जन (Arjuna's Excellence & Knowledge Dissemination)

अर्जुन को भगवान ने श्रेष्ठ कहा क्योंकि वह सीधा, सरल और संग्रह करने वाला है। श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान अर्जुन के माध्यम से ही संसार को मिला। अर्जुन ने ज्ञान का अर्जन किया और फिर उसका विसर्जन हुआ—यानी वह ज्ञान पूरे समाज के लिए बहने लगा। वास्तव में वही व्यक्ति श्रेष्ठ है जो अर्जन के बाद विसर्जन करना जानता है।

कुली का उदाहरण और भार का सिद्धांत (Coolie Analogy & Burden Theory)

स्वामी जी कुली का उदाहरण देकर समझाते हैं कि कुली दूसरों का भार उठाता है लेकिन उसे अपना नहीं मानता। इसलिए वह निश्चिंत रहता है। जबकि हम लोग जीवन भर अपने ही भार को ढोते रहते हैं। हमें भी अपने कर्तव्य पूरे करने के बाद भार परमात्मा को सौंप देना चाहिए। निश्चिंतता ही परमानंद की ओर ले जाती है।

गीता में प्रपन्न और शरणागत का अंतर (Prapanna vs. Sharanagat in Gita)

गीता में “प्रपन्न” और “शरणागत”—दो शब्द आते हैं। प्रपन्न वह है जो अपने बल पर भगवान को पकड़ता है, जबकि शरणागत वह है जिसे भगवान स्वयं संभालते हैं। अर्जुन दूसरे अध्याय में प्रपन्न होता है और अठारहवें अध्याय में शरणागत बनता है। यह दिखाता है कि पूर्ण समर्पण धीरे-धीरे आता है।

संपन्नता बनाम संस्कार (Wealth vs. Sanskar)

आज मनुष्य प्रपन्न या शरणागत होने के बजाय केवल संपन्न होना चाहता है। लेकिन संपन्नता के साथ संस्कार न हों तो वह बोझ बन जाती है। संपन्नता को शुद्ध करने का मार्ग है—संस्कार, प्रार्थना, शास्त्रों का अध्ययन और जीवन की पवित्रता।

मनुष्य की परीक्षा के प्रमाण (Testing of Human Character)

जैसे सोने की शुद्धता कसौटी, काटने, अग्नि और हथौड़े से परखी जाती है, वैसे ही मनुष्य की परीक्षा उसके अध्ययन, आचरण, नम्रता और कर्म से होती है। केवल वेद पढ़ लेने से नहीं, बल्कि शुद्ध आचरण से व्यक्ति महान बनता है।

सीता जी के तेज और नैतिक बल (Sita's Tejas & Moral Strength)

सीता जी के तेज का उदाहरण देकर बताया गया है कि नैतिक बल इतना शक्तिशाली होता है कि रावण जैसा बलशाली व्यक्ति भी उसके सामने डर जाता है। इसी नैतिक तेज से गांधी जी जैसे महापुरुषों ने पूरे देश को जागृत कर दिया।

परमात्मा की शक्तियाँ और नरसिंह लीला (Divine Powers & Narasimha Leela)

अंत में स्वामी जी कहते हैं कि परमात्मा की शक्तियाँ अद्भुत हैं। भक्त की रक्षा के लिए भगवान स्वयं असंभव लगने वाली लीलाएँ करते हैं—जैसे नरसिंह रूप धारण करना। यही कारण है कि मनुष्य को अहंकार छोड़कर परमात्मा की शरण में जाना चाहिए।

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