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गीता के माध्यम से जानिए मोह और शोक से कैसे बचें | Swami Styamitranand ji Maharaj Pravachan

स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी महाराज यह स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य को परमात्मा के प्रति प्रपन्न क्यों होना चाहिए। क्योंकि ईश्वर के भीतर असीम शक्ति है और उनकी लीलाएँ मानव-बुद्धि से परे हैं।

श्लोक: लीला अद्भुत व्यसनने देवाय तस्मै नमः

संस्कृत में कहा गया है—“लीला अद्भुत व्यसनने देवाय तस्मै नमः।” इस श्लोक के माध्यम से एक महापुरुष ने भगवान से प्रेमपूर्ण व्यंग्य करते हुए कहा कि आपकी ललित लीलाएँ तो अत्यंत सुंदर हैं, पर आप कभी-कभी ऐसी दुर्ललित लीलाएँ भी करते हैं जिन्हें साधारण मनुष्य समझ नहीं पाता।

भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए परमात्मा अपने स्वरूप की भी चिंता नहीं करते और आधे सिंह, आधे मनुष्य के रूप में नरसिंह अवतार धारण कर लेते हैं। जो बांके बिहारी और रास बिहारी अपने सौंदर्य के लिए पूज्य हैं, वही भगवान अपने भक्त की रक्षा के लिए मत्स्य, वराह या नरसिंह जैसे रूपों में प्रकट हो जाते हैं। यह उनकी दुर्ललित लीला है, इसलिए ऐसे परमात्मा को बार-बार नमन किया जाता है।

शरणागति का वास्तविक अर्थ

इसी भाव में अर्जुन भगवान से कहता है—“शाधि माम्, त्वां प्रपन्नम्,” अर्थात अब मैं आपकी शरण में आ गया हूँ, अब आपको ही मुझे ज्ञान देना होगा।

प्रपन्न होने का अर्थ है स्वयं को पूरी तरह भगवान के हाथों सौप देना, जैसे बंदरिया का बच्चा अपनी माँ को कसकर पकड़ लेता है। भगवान प्रसन्न होकर कहते हैं कि जब कोई प्रपन्न हो जाता है, तब उसे अलग से प्रयत्न नहीं करना पड़ता; ईश्वर स्वयं उसे संभाल लेते हैं।

भगवान अपने अंश को महान बनाना चाहते हैं। वे चाहें तो अर्जुन को क्षणभर में ज्ञान दे सकते थे, पर तब गीता का ज्ञान समस्त विश्व को प्राप्त न होता। इसलिए अर्जुन की जिज्ञासा और शरणागति आवश्यक थी।

गुरु से प्रश्न करने का सही तरीका

अर्जुन आगे प्रश्न करता है कि कभी आप कर्म की बात करते हैं और कभी ज्ञान की, जिससे उसे भ्रम होता है। वह निवेदन करता है कि कृपया वह मार्ग बताइए जिससे उसका श्रेय सिद्ध हो।

महाराज यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि गुरु से प्रश्न करना गलत नहीं है, पर प्रश्न पूर्वाग्रह से नहीं होने चाहिए। जिज्ञासा के साथ मन का रिक्त होना आवश्यक है। जैसे शंख तभी ध्वनि करता है जब वह भीतर से खाली हो, वैसे ही मन भी तभी ईश्वर की वाणी को ग्रहण कर सकता है जब वह रिक्त हो।

बांसुरी का रहस्य जो कोई नहीं बताता

इसी कारण श्रीकृष्ण को बांसुरी अत्यंत प्रिय है। बांसुरी ने कठोर तपस्या की—वृक्ष से अलग हुई, काटी गई, अग्नि में तपाई गई, छिद्र किए गए—फिर भी उसने कोई पीड़ा प्रकट नहीं की। क्योंकि वह जानती थी कि यदि वह स्वयं को पूर्णतः रिक्त नहीं करेगी, तो कृष्ण का स्वर उसके भीतर से कैसे निकलेगा।

भगवान कहते हैं कि बांसुरी का अपना कुछ शेष नहीं रहा, इसलिए उसमें जो भी स्वर है वह केवल ईश्वर का है। हम सभी के लिए बांसुरी बन पाना कठिन है, पर थोड़ा-थोड़ा रिक्त होना तो संभव है।

भगवान हृदय में क्यों नहीं आते?

जब मनुष्य भजन करता है और भगवान को बुलाता है, लेकिन अपने हृदय में क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार और वासनाओं को आसन दे रखता है, तब भगवान आकर लौट जाते हैं क्योंकि उनके बैठने के लिए स्थान नहीं होता। इसलिए पहले हृदय में भगवान के लिए आसन बनाना आवश्यक है।

ज्ञानयोग बनाम कर्मयोग बनाम भक्तियोग

भगवान कहते हैं कि संसार में दो प्रकार की निष्ठाएँ हैं—ज्ञानयोग और कर्मयोग। ज्ञानयोग कठिन है और सामान्य जन के लिए कर्मयोग तथा भक्ति का मार्ग अधिक सहज और व्यावहारिक है।

कर्मयोग का अर्थ है अपने कर्म को पूर्ण कुशलता और निष्ठा के साथ करना। महाराज एक उदाहरण देते हैं कि जैसे लाख का चूड़ा बनाने वाला कारीगर अपने काम में इतना तल्लीन रहता है कि वह जुलूस तक नहीं देख पाता, क्योंकि यदि लाख ठंडी हो गई तो काम बिगड़ जाएगा। वही कर्मयोग है।

जब भक्ति करते-करते मन पिघल जाए और आँखें नम हो जाएँ, तब भगवान से कहना चाहिए कि अब मेरा मन तैयार है, अब आप इसमें स्थिर हो जाइए। एक बार परमात्मा हृदय में स्थिर हो जाएँ, तो वे फिर कभी छोड़कर नहीं जाते, क्योंकि वे किरायेदार नहीं बल्कि स्वामी हैं।

अंततः यही संदेश है कि पापयुक्त रहते हुए ईश्वर-स्मरण कठिन होता है, इसलिए स्मरण के साथ-साथ अपने दोषों को धीरे-धीरे त्यागते रहना चाहिए। जैसे-जैसे मन शुद्ध होता जाता है, परमात्मा स्वयं निकट आते जाते हैं। भगवान की छटपटाहट भी उतनी ही होती है जितनी भक्त की।

थोड़ा कर्म, थोड़ी भक्ति और थोड़ी रिक्तता—और तब परमात्मा स्वयं जीवन का संचालन संभाल लेते हैं।

FAQ

शरणागति का वास्तविक अर्थ क्या है?

प्रपन्न होने का अर्थ है स्वयं को पूरी तरह भगवान के हाथों सौप देना। जब कोई पूरी श्रद्धा से प्रपन्न हो जाता है, तब ईश्वर स्वयं उसका पूरा जीवन संभाल लेते हैं।

भगवान किसे सबसे ज्यादा पसंद करते है?

भगवान को उस भक्त से सबसे ज्यादा प्रेम है जिसका मन रिक्त और निष्काम है। बांसुरी की तरह जो अपना सब कुछ छोड़ देता है।

भगवान हृदय में कब आते है?

जब तुम अपने हृदय से क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार को हटा कर उसके लिए खाली जगह बनाओ। एक बार वह आ जाये तो फिर कभी नहीं जाता।