शुभ संकल्प: शुभ विचार कैसे आये || Swami Satyamitranand Giri ji Maharaj | Shubh Vichaar Kaise Aaye
यह प्रस्तुति भारतीय आध्यात्मिक चेतना, सनातन परंपरा और श्रीमद्भगवद्गीता के गूढ़ रहस्यों को अत्यंत सरल, प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी रूप में प्रस्तुत करती है। इस विशेष प्रवचन में पूज्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज भारत माता की भावना से ओत-प्रोत होकर यह स्पष्ट करते हैं कि हमारा जीवन, हमारा चिंतन और हमारी संस्कृति किन आध्यात्मिक आधारों पर टिकी हुई है।
स्वामी जी बताते हैं कि यह कोई साधारण संयोग नहीं है कि हम सभी हनुमान जी की छत्रछाया में बैठे हैं। वे एक अत्यंत रोचक दृष्टांत के माध्यम से यह समझाते हैं कि यदि अर्जुन के रथ पर हनुमान जी विराजमान न होते, तो शायद भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश ही न दे पाते। “कपिध्वज” केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि ज्ञान, करुणा, शौर्य और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। हनुमान जी की उपस्थिति स्वयं यह संदेश देती है कि अन्याय के विनाश और धर्म की स्थापना में कोई पाप नहीं, बल्कि वही परम कर्तव्य है। इस प्रवचन में विशेष रूप से कलियुग में नाम-स्मरण के महत्व पर प्रकाश डाला गया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी के वचनों के माध्यम से स्वामी जी समझाते हैं कि विचार और संकल्प ही किसी भी कर्म की नींव होते हैं। संकल्प से विचार, विचार से कर्म और कर्म से फल—यह जीवन का शाश्वत नियम है। यदि संकल्प शुद्ध हो, तो कर्म भी कल्याणकारी बनते हैं। और संकल्प की शुद्धि का सबसे सरल मार्ग है—भगवान के नाम का स्मरण।
स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि सुख और आनंद में क्या अंतर है। सुख सीमित है, जबकि आनंद असीम। भारतीय संस्कृति की विशेषता यही है कि वह सुख के बीच रहते हुए भी आनंद की खोज का मार्ग दिखाती है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति को “बंधन से मुक्ति की यात्रा” कहा गया है। अनेक में एक को देखने की दृष्टि, विविधता में एकता का अनुभव—यही सनातन परंपरा की आत्मा है। श्रीमद्भगवद्गीता को स्वामी जी एक अत्यंत उदार, सर्वग्राही और वैश्विक ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह केवल किसी एक धर्म या समुदाय का ग्रंथ नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के कल्याण की घोषणा है—“सर्वभूत हिते रताः”। मनुष्य, पशु, वृक्ष, पर्यावरण—सभी इसके अंतर्गत आते हैं। “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना गीता के प्रत्येक श्लोक में जीवित दिखाई देती है।
इस प्रवचन का सबसे अनोखा पक्ष यह है कि गीता का उपदेश किसी शांत आश्रम या एकांत नदी तट पर नहीं, बल्कि युद्धभूमि में दिया गया। जब अर्जुन विषादग्रस्त होता है, तब भगवान स्वयं उसे पहले विषाद और फिर प्रसाद देते हैं। यही जीवन का सत्य है—विषाद और प्रसाद, दोनों परमात्मा की ही कृपा हैं।