दुर्गा भाभी Durgawati Devi - भारत माता

दुर्गा भाभी का प्रारंभिक जीवन और परिवार

दुर्गा भाभी का जन्म 27 अक्टूबर 1969 को शहजादपुर ग्राम पनीर बांके बिहारी में हुआ था। उनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में कार्यरत थे और उनकी माता श्वेता पंडित थीं। बचपन से ही दुर्गा भाभी की धार्मिक आस्था गहरी थी, खासकर दुर्गा अष्टमी के दौरान। उन्होंने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में अपने परिवार के साथ भक्तिपूर्ण वातावरण में समय बिताया। दुर्गा भाभी का विवाह लाहौर में भगवतीचरण वोहरा के साथ हुआ था, जो कि भारतीय रेलवे में उच्च पद पर तैनात थे। उनके पति अंग्रेज सरकार के खिलाफ थे, और उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया।
भगवतीचरण वोहरा की तरह, दुर्गा भाभी ने भी भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने के लिए अपने जीवन को समर्पित किया। जब उनके पिता का निधन हुआ, तब दुर्गा भाभी और उनके पति ने अपना जीवन स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया। 1922 में भगवतीचरण वोहरा ने ख्याल कॉलेज से बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की, जबकि दुर्गा भाभी ने भी अपनी शिक्षा में उत्कृष्टता प्राप्त की।

दुर्गा भाभी का विवाह और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

दुर्गा भाभी के मायके और ससुराल दोनों ही संपन्न थे। उनके ससुर शिवचरण ने उन्हें 40,000 रुपये दिए थे, जिनका उपयोग उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए किया। उनका यह धन, जिसे वे संकट के समय इस्तेमाल करने के लिए देते थे, स्वतंत्रता संग्राम में सहायक साबित हुआ। मार्च 19 व 26 मई को भगवतीचरण वोहरा और भगत सिंह ने मिलकर नौजवान भारत सभा का प्रारूप तैयार किया और रामचंद्र ठाकुर के साथ मिलकर इसकी स्थापना की। इस सभा के अंतर्गत सैकड़ों नौजवानों ने देश को आजाद करने के लिए अपनी जान की बलि देने का संकल्प लिया।

दुर्गा भाभी का संघर्ष और साहसिक कार्य

दुर्गा भाभी का क्रांतिकारी जीवन बहुत साहसिक था। उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए, जिनमें से सबसे बड़ा कार्य था लाहौर में लाला लाजपत राय पर हुए हमले का बदला लेना। दुर्गा भाभी ने भगत सिंह के साथ मिलकर कई साहसिक कार्यों में भाग लिया। एक बार, जब भगत सिंह और उनके साथियों पर खतरा था, दुर्गा भाभी ने यूरोपीय वस्त्र पहनकर भगत सिंह को छिपाने में मदद की। वे अपना रूप बदलकर भारतीय क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से बचाने में सफल रहीं।
इसके अलावा, दुर्गा भाभी ने भगत सिंह को गिरफ्तार होने से बचाने के लिए कई प्रयास किए। 1929 में केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने के बाद जब भगत सिंह गिरफ्तार हो गए, तो दुर्गा भाभी ने उन्हें जेल से बाहर निकालने के लिए कई योजनाएं बनाई। हालांकि, 28 मई 1938 को भगवतीचरण वोहरा की मृत्यु हो गई और दुर्गा भाभी के लिए यह एक कठिन समय था। उनकी संपत्ति को जब्त कर लिया गया, लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी मुहिम जारी रखी। दुर्गा भाभी ने मुंबई पुलिस कमिश्नर को भी गोली मारी थी, जिसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए कई प्रयास किए। लेकिन जब तक पुलिस को कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला, तब तक वे ज्यादा दिन जेल में नहीं रह सकी।

दुर्गा भाभी का शिक्षण कार्य और जीवन का अंतिम समय

चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद, जब क्रांतिकारी दल नेतृत्वविहीन हो गया, दुर्गा भाभी ने 1937 से 1982 तक लखनऊ में एक शिक्षण केंद्र चलाया। दुर्गा भाभी का योगदान स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण था। उन्होंने न केवल क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया, बल्कि साथी क्रांतिकारियों के लिए पिस्तौल लाने और उन्हें प्रशिक्षण देने का कार्य भी किया। चंद्रशेखर आजाद को जो पिस्तौल मिली थी, वह दुर्गा भाभी ने ही उन्हें दी थी। वे पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग लाहौर के वातायनपुर में देती थीं। भगवतीचरण वोहरा के साथ विवाह करने के बाद, दुर्गा भाभी ने उनके साथ मिलकर कई क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। उनका घर क्रांतिकारियों का आश्रय स्थल बन गया था, और उनके सेवा-सत्कार के कारण सभी उन्हें आदर और प्रेम से 'भाभी' कहने लगे थे।
अपने साहसिक कार्यों और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान के कारण, दुर्गा भाभी आज भी भारतीय इतिहास में एक प्रेरणास्त्रोत के रूप में याद की जाती हैं।

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