ब्रह्मांड पुराण: ब्रह्मांड की उत्पत्ति का रहस्य | काल गणना और चारों युगों का वर्णन.
भारतीय संस्कृति और पुराणों का महत्व
संस्कृति किसी भी देश की आत्मा मानी जाती है, और वह आत्मा तभी उजागर होती है जब हम अपने इतिहास, परंपराओं, और धार्मिक दृष्टिकोण को समझ पाते हैं। भारतीय संस्कृति में यह गहन ज्ञान और विवेक का खजाना हमारे पुराणों में छिपा हुआ है। इन पुराणों का अध्ययन हमें न केवल हमारे अतीत से जोड़ता है, बल्कि हमारे जीवन के उद्देश्य और मूल्य को भी समझने का मार्ग प्रदान करता है।
आज हम जिस पुराण की बात करने जा रहे हैं, वह है ब्रह्मांड पुराण, जो भारतीय पुराण साहित्य का एक अनमोल रत्न है।
ब्रह्माण्ड पुराण का परिचय
समस्त ब्रह्मण्ड का वर्णन इसमें प्राप्त होने के कारण ही इसे यह नाम दिया गया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस पुराण का विशेष महत्व है। विद्वानों ने ब्रह्मण्ड पुराण को वेदों के समान माना है। यह पुराण ‘पूर्व’ ‘मध्य’ और 'उत्तर' - तीन भागों मैं विभक्त है। पूर्व भाग में 'प्रक्रिया' और 'अनुषंग' नामक दो पाद हैं। मध्य भाग 'उपोद्घात' पाद के रूप में है। और उत्तर भाग 'उपसंहार' पाद प्रस्तुत करता है। इस पुराण में लगभग बारह हजार श्लोक और 156 अध्याय हैं।
ब्रह्माण्ड पुराण के भाग
पूर्व भाग:
-
नैमिष उपाख्यान, हिरण्यगर्भ प्रादुर्भाव, देवऋषि की सृष्टि, कल्प, मन्वन्तर, रुद्रसर्ग, ऋषि सर्ग, अग्नि सर्ग, गंगावतरण आदि।
-
खगोल वर्णन, सूर्य, ग्रहों, नक्षत्रों एवं आकाशीय पिंडों का विस्तृत विवरण।
-
समुद्र मंथन, मंत्रों के विविध भेद, वेद की शाखाओं का उल्लेख।
मध्य भाग:
-
श्राद्ध और पिण्डदान सम्बन्धी विषयों का विस्तार से वर्णन।
-
परशुराम चरित्र, राजा सगर की वंश परंपरा, गंगा की उपासना।
-
सूर्य और चंद्र वंश के राजाओं का वर्णन।
उत्तर भाग:
-
त्रिपुर सुंदरी की प्रसिद्ध कथा, जिसे 'ललितोपाख्यान' कहा जाता है।
-
भंडासुर उद्भव कथा और उनके वंश के विनाश का वृतांत।
ब्रह्माण्ड पुराण की उत्पत्ति और शिक्षाएँ
ब्रह्मण्ड पुराण का उपदेष्टा प्रजापति ब्रहमा जी को माना जाता है। इस पुराण को पुण्य प्रदान करने वाला और सर्वाधिक पवित्र माना गया है। यह यश, आयु और श्री वृद्धि करने वाला पुराण है। इसमें धर्म, सदाचार, नीति, पूजा उपासना और ज्ञान-विज्ञान की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इस पुराण के प्रारम्भ में बताया गया कि गुरु अपना श्रेष्ठ ज्ञान सर्वप्रथम अपने सबसे योग्य शिष्य को देता है। जैसे- ब्रह्मा जी ने यह ज्ञान वशिष्ठ को, वशिष्ठ ने अपने पौत्र पराशर को, पराशर ने जातुकर्ण्य ऋषि को, जातुकर्ण्य ने द्वैपायन को, द्वैपायन ऋषि ने इस पुराण का ज्ञान अपने पाँच शिष्यों – जैमिनी, सुमन्तु, वैशम्पायन, पेलव और लोमहर्षण को दिया। लोमहर्षण, सूत जी ने इसे भगवान वेद व्यास से सुना। फिर नैमिषारण्य में एकत्रित ऋषि मुनियों को सूतजी ने इस पुराण की कथा सुनायी।
पुराणों के विविधि पाँचों लक्षण इस पुराण में उपलब्ध हैं। कहा जाता है कि इस पुराण का प्रतिपाद्य विषय प्राचीन भारतीय ऋषि जावा द्वीप जो वर्तमान में इण्डोनेशिया है, वहाँ लेकर गये थे । इस पुराण का अनुवाद वहाँ की प्राचीन भाषा में किया गया था. जो आज भी उपलब्ध है।
ब्रह्माण्ड पुराण में भारत का वर्णन
ब्रह्माण्ड पुराण में भारत वर्ष का वर्णन - करते हुए, इसे 'कर्मभूमि' कहा गया है। यह कर्मभूमि- भागीरथी गंगा के उद्गम स्थल से कन्याकुमारी तक फैली हुयी है, जिसका विस्तार नौ हजार योजन का है। इसमें सात पर्वत हैं। गंगा, सिन्धु, सरस्वती, नर्मदा, कावेरी, गोदावरी आदि सैकड़ों पावन नदियाँ हैं। यह देश कुरु, पांचाल, कीलंग, मगध, शाल्व, कौशल, केरल, सौराष्ट्र आदि अनेक नगरों में विभाजित है। यह आर्यों की ऋषि भूमि है।
काल गणना का उल्लेख भी इस पुराण में है। चारों युगों का वर्णन भी इसमे है। गंगावतरण की कथा, उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव का चरित्र, कश्यप, पुलस्त्य, अत्रि, पराशर आदि ऋषियों का प्रसंग भी अत्यन्त रोचक है।
ब्रह्माण्ड पुराण: एक विश्वकोश
यह पुराण एक विश्वकोश की तरह है, जिसमें ब्रह्मांड, विज्ञान, वंशावली, नैतिकता, भूगोल, योग, कर्तव्य, संस्कार, और कई अन्य विषयों की जानकारी दी गई है। यह हिन्दू धर्म और हमारी संस्कृति की वो पावन धरोहर है, जो आज भी ज्ञान-प्रसार और जन-कल्याण में अत्यंत सहायक है।
हिन्दू पौराणिक कथाओं के विस्तृत आध्यात्मिक संदेश प्राप्त करने के लिए Bharat Mata Channel को सब्सक्राइब करें। भारत माता वेबसाइट पर और अधिक धार्मिक एवं पौराणिक ज्ञान प्राप्त करें।